Sunday, 3 August 2014

THE STENCH/दुर्गन्ध (Nazmaa)

THE STENCH
# # #
O Parrot !
You repeat the words
Without
Converting them in
True knowledge,
Like one
Who goes on
Eating,
Just gulping down
Whatever comes the way 
No tasting 
No chewing
No care for 
Congeniality 
No digesting,
And
Vomiting  in public,
Uff...
The stench.

दुर्गन्ध (सह रचनाकार-अर्पिता)
# # #
अरे शुक !
कैसा है रे तू 
किये जाता है
आवृति 
रटे रटाये शब्दों की,
बिना किये 
संपरिवर्तन उनका 
सच्चे ज्ञान में,
बस वैसे ही 
जैसे कोई 
खाये जाता है 
निरंतर, 
निगलते हुए 
जो भी होता है प्राप्य, 
ना कोई स्वाद ,
ना ही चर्वण 
ना ही कोई 
पर्वाह 
शरीर और मन संग'
अनुकूलता की, 
ना ही पाचन,
बस किये जाता है 
वमन 
सब के बीच,
उफ़....
कैसी है 
यह दुर्गन्ध ! 

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