Sunday, 3 August 2014

NEW EXISTENCE/नव अस्तित्व (Nazmaa)

NEW EXISTENCE..
# # # # # #
You wished me to
Be social
Under cover of which
You imposed your 
Own egocentric norms,
Emotion 
A liberty
Not permitted
To social animals
You urged, 
Forgetting 
We met like individuals 
Lived like pals,
The social stamp
Reminded you of
Everything 
Out of blue,
An MCP
Emerged out of you
With a Rule Book in hand
To tame me
Like the horses
Of  a stud farm,
Suddenly for you
I became a 
Woman
From beloved or spouse
To bow before your
Unholy dictates,
To me marriage is
Melting of two souls,
Not a slavery of
Woman to man
Or 
Man to woman,
Its for creation of a new
Existence
By merger of two existences,
Not to be gulped by
Your entity
As man, the almighty......

नव अस्तित्व (भावानुवादक -मुदिता गर्ग)
# # # #

चाहा था तुमने
बनाना समाजचारी
मुझ को ,
ओट में जिसकी
किये जा रहे थे तुम
आरोपित मुझ पर
अहमकेंद्रित प्रतिमान 
स्वयं के.....

होती नहीं 
अनुमति
सामाजिक प्राणियों को
भाव और भावानुरूपी
स्वच्छंदता की
कहा था ना तुमने 
यही तो
अपना सारा बल देकर ...

भुला दिया था 
तुमने के
मिले थे ना हम
जुदा शख्सियतों की तरह
रहे थे मगर संग 
दो जिगरी दोस्तों की तरह....

उस सामाजिक ठप्पे ने, 
दिला दिया था
अचानक ही याद 
सब कुछ तुमको,
आया था सामने
एक पुरुष पूर्वाग्रही
हाथों में लिए
किताब कायदों की
साधने मुझको
किसी स्टड फ़ार्म के
घोड़े की तरह.......

हो गयी थी
हठात ही मैं
एक औरत 
महबूबा या बीवी से,
महज झुक जाने के लिए
सम्मुख  तुम्हारे
कुटिल आदेशों के......

विवाह तो  है
मेरे जाने
पिघल जाना  
दो रूहों  का,
ना कि गुलामी
किसी मर्द  की 
औरत के लिए 
या
एक औरत की 
मर्द  के लिए ...

विवाह तो  है 
सृजन
एक नव-अस्तित्व का
दो अस्तित्वों के
विलयन से ,
ना कि
हो कर
पुरुष -सर्वशक्तिमान
निगला जाना 
सब कुछ
बाजरिये  
किसी हस्ती के ......

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