Sunday, 3 August 2014

FAITH DOES NOT MAKE US COMMUNAL...(Nazmaa)

FAITH DOES NOT MAKE US COMMUNAL...
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You pray
Ring the bell,
Burn incense,
Sing bhajans,
Recite aayats,
Observe upvaas 
Keep rozaas
Have i ever intruded ?
Have i ever objected ?

Why then
You sought
When i watch a movie,
Enjoy a cool beer,
Dance and sing,
And Help
A sex-worker to fight against Aids,
A drug addict to rehabilitate 
A poor child to study
All not in the name of
Ishvar or Allah
But in the name of
Sheer HUMANITY....

I accept your
Branding me
A Non-believer
As i don't believe in you
And like
In hypocrisy
And pseudo faith like yours,
Your frustration
To accuse me of
Blasphemy
Would yield nothing as
I damn care for your
Updeshs
Fatwas
Full of biased and ill interpretation 
Shastras and books...

Grow my friends Grow
This is Bharat
Where even
Atheist or nonbeliever like
Charvaak was
Respectfully called
Mahrishi Charvaak
Dont teach Secularism
To Bhartiy Masses
Who are inheritors
To a culture of
'Sarv Dharm Sambhav '..

When logic snaps,
Discourse stumbles,
The insidious power of
Hysteria would send
This great country 
Towards miseries,
Remember
Faith not make us
Communal
Does so the 
Human nature,
Dont divide the nation
In the name of
Religion
Tum ko kasam hai
Tumhare Allah ki
Tumhare Ram ki
Tumhare Jesus ki
Tumhare Guru Granth Sahab ki
Tumhare 'Bal aur Buddhi' ki...

आस्था नहीं बनाती साम्प्रदायिक हमें (muditaji dwara)
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अता करते हो 
तुम नमाज़ 
दोहराते हो 
आयतें कुरान शरीफ़ की 
रख लेते हो रोज़े भी ,
करते हो तुम पूजा 
बजा कर घंटी 
जलाते हो अगरबत्ती 
गाते हो भजन 
रख लेते हो उपवास भी 
कहो ना 
किया है कभी 
कोई भी हस्तक्षेप मैंने  ?
करी है कभी कोई भी आपत्ति ?

क्यों दहाड़ते हो फिर तुम 
यदि होती हूँ मैं आनंदित 
देख कर फिल्म कोई 
या पी कर ठंडी बीयर 
या नाच कर गा कर 
या करके मदद 
एक यौनकर्मी की 
लड़ रही हो  जो 
जानलेवा एड्स से,
या बनती हूँ सहायक 
ड्रग व्यसनी के पुनःस्थापन में, 
या एक गरीब बच्चे को पढाने में
हाँ  !
ईश्वर और अल्लाह के 
नाम पर नहीं 
बल्कि 
सिर्फ इंसानियत के नाम पर ..

स्वीकार है मुझे 
तुम्हारा
मुझ पर  चस्पां किया 
नास्तिक का ठप्पा 
क्यूंकि 
नहीं है विश्वास 
मुझे तुम पर 
और ना ही पसंद है 
तुम्हारा पाखंड 
और 
मिथ्या निष्ठाएं
मुझको ,
नहीं देगा 
कोई भी प्रतिफल 
तुम्हारी कुंठा से 
उपजा 
मुझ  पर किया गया 
ईश-निंदक होने का 
दोषारोपण .....
 

नहीं है परवाह मुझे 
रत्ती भर भी 
तुम्हारे उपदेशों की,  
फतवों की
और 
पूर्वाग्रह से भरी 
शास्त्रों और किताबों की 
तुम्हारी व्याख्याओं की ....

उठो मेरे मित्रों !
करो स्वयं को 
विकासमान 
यह भारत है 
जहां एक नास्तिक 
या 
अनीश्वरवादी चर्वाक को भी 
ससम्मान
पुकारा जाता है  
महर्षि चर्वाक .....

मत सिखाओ 
साम्प्रदायिकता 
भारतीय जनमानस को 
जिसे मिली है 
उत्तराधिकार में 
'सर्व धर्म सम भाव' की 
संस्कृति....
जब तर्क
गुर्राता है 
तब 
लड़खड़ा जाता है
कथोपकथन 
निबंध और प्रवचन,
और सुन लो 
धकेल देगी
उन्माद की 
कपट भरी शक्ति 
इस महान राष्ट्र को 
दुर्दशा की ओर ,
याद रखो 
आस्था नहीं बनाती 
साम्प्रदायिक हमें 
बल्कि करती है ऐसा 
मानवीय प्रवृति .. 

मत बांटों देश को 
धर्म के नाम पर 
कसम है तुम को 
तुम्हारे अल्लाह की
तुम्हारे राम की 
तुम्हारे यीशु की 
तुम्हारे गुरु ग्रन्थ साहेब की 
तुम्हारे 'बल, बुद्धि और विवेक ' की ......

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