आत्मश्लाघा...
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होता है
झीना सा
किन्तु
लम्बा सा
अंतर,
आत्मश्लाघा
और
आत्मबोध में,
क्यों ना जानूं मैं
क्या हूँ मैं ?
क्या होना है
मुझ को ?
मैं नहीं मोहताज़
सुनने तुम से
क्या हूँ मैं,
और
ना ही
पीटना है मुझे
ढिंढोरा
क्या हूँ मैं ?
औढ़ी हुई
थोथी विनम्रता
पाखंड है
सहजता नहीं,
कहना स्वयं को
'मो सम कौन
कुटिल खल कामी'
मिथ्या दंभ है
शालीनता नहीं,
गिराना है यदि
अहम् को,
पकने दो उस को,
अधपका फल
टूटता है
डाल से
स्वतः स्वाभाविक
गिरता नहीं,
सड़ जाता है पान
जो फिरता नहीं,
अड़ जाता है तुरंग
जो फैरा जाता नहीं,
बोलो ना
बेझिझक
क्या हो तुम ?
बिना जल छाप
सटीक मूल्यांकों
अपने अनुक्रमांक
एवम
मुद्रा चिन्ह के
स्पष्ट प्रदर्शन के
कोई करेंसी नोट
इस बाज़ार में
चलता नहीं,
धूप छाँव के
सामंजस्य बिना
कोई भी
वृक्ष, लता,पता,
पुष्प और फल
फलता नहीं...
होता है
झीना सा
किन्तु
लम्बा सा
अंतर,
आत्मश्लाघा
और
आत्मबोध में,
क्यों ना जानूं मैं
क्या हूँ मैं ?
क्या होना है
मुझ को ?
मैं नहीं मोहताज़
सुनने तुम से
क्या हूँ मैं,
और
ना ही
पीटना है मुझे
ढिंढोरा
क्या हूँ मैं ?
औढ़ी हुई
थोथी विनम्रता
पाखंड है
सहजता नहीं,
कहना स्वयं को
'मो सम कौन
कुटिल खल कामी'
मिथ्या दंभ है
शालीनता नहीं,
गिराना है यदि
अहम् को,
पकने दो उस को,
अधपका फल
टूटता है
डाल से
स्वतः स्वाभाविक
गिरता नहीं,
सड़ जाता है पान
जो फिरता नहीं,
अड़ जाता है तुरंग
जो फैरा जाता नहीं,
बोलो ना
बेझिझक
क्या हो तुम ?
बिना जल छाप
सटीक मूल्यांकों
अपने अनुक्रमांक
एवम
मुद्रा चिन्ह के
स्पष्ट प्रदर्शन के
कोई करेंसी नोट
इस बाज़ार में
चलता नहीं,
धूप छाँव के
सामंजस्य बिना
कोई भी
वृक्ष, लता,पता,
पुष्प और फल
फलता नहीं...
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