मानव केवल मात्र मानव...
# # # # #
भरे हैं
दुनिया में
दोपाये
चौपाये
बेपाये,
चलते
रेंगते
तैरते
उड़ते
प्राणी,
करता है
किन्तु
आचरण
प्रकृति विरुद्ध
बस मानव
केवल मात्र
मानव....
करता है
चिंता
आगत की
करते हुए
चिंतन
विगत का
नकारते हुए
वर्तमान को,
बस मानव
केवल मात्र
मानव...
मिथ्या आवरण
देकर
व्यवहार को
कहता है
सभ्यता,
उधार की दृष्टि
रखने का
हो गया है आदी
बस मानव
केवल मात्र
मानव...
दूजों को
मारते हैं
लगभग
सभी प्राणी,
किन्तु
मार कर
स्वशरीर और आत्मा
करता है
खुदकुशी
बस मानव
केवल मात्र
मानव....
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भरे हैं
दुनिया में
दोपाये
चौपाये
बेपाये,
चलते
रेंगते
तैरते
उड़ते
प्राणी,
करता है
किन्तु
आचरण
प्रकृति विरुद्ध
बस मानव
केवल मात्र
मानव....
करता है
चिंता
आगत की
करते हुए
चिंतन
विगत का
नकारते हुए
वर्तमान को,
बस मानव
केवल मात्र
मानव...
मिथ्या आवरण
देकर
व्यवहार को
कहता है
सभ्यता,
उधार की दृष्टि
रखने का
हो गया है आदी
बस मानव
केवल मात्र
मानव...
दूजों को
मारते हैं
लगभग
सभी प्राणी,
किन्तु
मार कर
स्वशरीर और आत्मा
करता है
खुदकुशी
बस मानव
केवल मात्र
मानव....
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