Saturday, 2 August 2014

बेवक्त की हर मौत शहादत नहीं होती....(मेहर)

बेवक्त की हर मौत शहादत नहीं होती....
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बेवक्त की हर मौत शहादत नहीं होती, 
लिखी हुई हर बात सदाकत नहीं होती,
बोये को काटना होता है यक दिन ज़रूर,
नसीबे झूठ में कभी तवालत नहीं होती.

चढ़ा कर मुलम्मा शैतानी को शराफत का,
औढ़ लेते हैं हम क्यों लबादा नफासत का,
हो जाते हैं हम शुमार रस्मी मातमपुर्सी में,
फौत हो गया उसकी मलामत नहीं होती.

जिसे समझा नहीं कभी वो मर्गूब हो गया 
बिखरा बिखरा सा था जो मर्बूत हो गया 
आलिम हुआ था जो हिज्जों को जोड़ कर 
पूछा मानी-ए--तहरीर तो सुकूत हो गया.

मुंसिफ ने एक गवाह को कातिल बना दिया ,
बेगुनाह को ताज़ीर के काबिल बना दिया,
धोकर झूठे गलेसरिनी आब-ए-अश्कों से,
यारों गधे को घोड़ा एक कामिल बना दिया.

(सदाकत=सच्चाई, तवालत=लम्बाई, फौत=मृत्यु, मलामत=भर्त्सना,मर्गूब=पसंदीदा/favorite , मर्बूत=क्रमबद्ध, आलिम=विद्वान, सुकूत=मौन,मुंसिफ=न्यायाधीश, ताज़ीर=सजा, मानी=अर्थ,कामिल=पूर्ण)

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