जिसे है नहीं कोई मेरी चाह.....
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जिसे है नहीं कोई मेरी चाह
हो कर दीवानी मैं क्यों दौडूँ
रोकर अंखिया अपनी फोडूं
जो ठुकराए मुझको ऐ सखी
मोहे क्यों हो उसकी परवाह. !! जिसे.....!!
सहा बहुत मैं अब नहीं सहूंगी
बदले ईंट के पत्थर दूंगी
चलूंगी अब मैं अपनी राह
नहीं है रंच मात्र भी डाह. !! जिसे.... !!
स्वभाव मेरा यह भोलाभाला
निर्बल मन मेरा मतवाला
तज दूंगी यह ठान चुकी मैं
भरूँ क्यों ठंडी-ठंडी आह . !! जिसे.... !!
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जिसे है नहीं कोई मेरी चाह
हो कर दीवानी मैं क्यों दौडूँ
रोकर अंखिया अपनी फोडूं
जो ठुकराए मुझको ऐ सखी
मोहे क्यों हो उसकी परवाह. !! जिसे.....!!
सहा बहुत मैं अब नहीं सहूंगी
बदले ईंट के पत्थर दूंगी
चलूंगी अब मैं अपनी राह
नहीं है रंच मात्र भी डाह. !! जिसे.... !!
स्वभाव मेरा यह भोलाभाला
निर्बल मन मेरा मतवाला
तज दूंगी यह ठान चुकी मैं
भरूँ क्यों ठंडी-ठंडी आह . !! जिसे.... !!
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