Saturday, 2 August 2014

ऐसा भी क्या फूल ! (मेहर)

ऐसा भी क्या फूल !
(पुरानी डायरी में दबी यह किसी की रचना आपसे शेयर कर रही हूँ. यह मेरी लिखी हुई नहीं है.)
ऐसा भी क्या फूल !

सज ना सका प्रिय की वेणी में,
गूँथ ना सका निज की श्रेणी में,
लगी ना जिसकी पंखुड़ियों पर प्रभु के पद की धूल !

ऐसा भी क्या फूल !

कर ना सका जो सहज समर्पण,
व्यर्थ गंवाया अर्पण का क्षण,
वृंत बन गया बंधन कर दी कहाँ मूल ने भूल ?

ऐसा भी क्या फूल !

अब क्या हो गया चयन अबेला,
शेष हो गयी पूजा की बेला,
मालिन के दृग में खटकेगा  काल बन कर यह शूल !

ऐसा भी क्या फूल !

(वृंत=डंठल,  अबेला=असमय, दृग= नेत्र.)

No comments:

Post a Comment