ऐसा भी क्या फूल !
(पुरानी डायरी में दबी यह किसी की रचना आपसे शेयर कर रही हूँ. यह मेरी लिखी हुई नहीं है.)
ऐसा भी क्या फूल !
सज ना सका प्रिय की वेणी में,
गूँथ ना सका निज की श्रेणी में,
लगी ना जिसकी पंखुड़ियों पर प्रभु के पद की धूल !
ऐसा भी क्या फूल !
कर ना सका जो सहज समर्पण,
व्यर्थ गंवाया अर्पण का क्षण,
वृंत बन गया बंधन कर दी कहाँ मूल ने भूल ?
ऐसा भी क्या फूल !
अब क्या हो गया चयन अबेला,
शेष हो गयी पूजा की बेला,
मालिन के दृग में खटकेगा काल बन कर यह शूल !
ऐसा भी क्या फूल !
(वृंत=डंठल, अबेला=असमय, दृग= नेत्र.)
No comments:
Post a Comment