क्या करूँ मैं ?
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तुम्हारे प्रेम का
प्रतिभार ले कर
क्या करूँ मैं ?
छम छम ने
कितने
सुर और ताल रचाए
नित्य अभिनव
गीत रचकर
प्रीतम
मैंने गुनगुनाये
तुम रहे
मूक-बघिर तो
क्या करूँ मैं ?
फूल का
कोमल स्पर्श भी
सुख ना
तुम को
दे सका था
शूल का चुभना भी
साजन
तुम को व्यथित
कर ना सका था,
अर्चना का
नित्यक्रम
व्यवहार लेकर
क्या करूँ मैं ?
तुम रहे तटस्थ
तट से,
ना लगाया
कभी
किसी को
घट से,
चूमने को आई
लहरें
लौटा दिया
निष्ठुर घनेरे,
कर आलिंगन
अचल पाषाण का
क्या करूँ मैं ?
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