मैं अधरों की फूंक......
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मैं
अधरों की
फूंक,
जगाती हूँ
जादू गीतों का
कान्हा की
मुरली में,
दिलाती हूँ
याद
विस्मृत राधा,
धर कर फिर
डोर साँसों की
चली आती हूँ
जीवन में....
मैं
कोयल की
हूक,
भगा कर
पतझड़
कूक से अपनी,
दिलाती हूँ
अंगडाई
मधु मास को,
बन जाती हूँ फिर
सुध साजन की,
विरहन के
व्याकुल मन में...
मैं
ओंस की बूँद ,
करके विश्राम
कोंपल की
नोंक
फूल की
कली
पते के
फैलाव
पर,
लेकर आनन्द
सुबह की
महक का,
पकड़ कर
अंगुली
सूर्यकिरण की,
चली आती हूँ,
आकाश के
आँगन में....
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