बांधों मत मेरे आकाश को......
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बांधों मत मेरे आकाश को.
मेरी पाँखे उड़े हर हर दिशी
गीत मेरे परसे सूर्य शशि
तन की सीमाओं से तुम
बांधो मत मन के विकास को...
हर शै से मैं टक्कर ले लूँ,
अलभ्य हाथ बढाकर ले लूँ,
शक्ति मेरी को न्यून ना आंको
बांधो मत अदम्य विश्वास को...
मूरत में मैं प्राण को भर दूँ,
असंभव को मैं संभव कर दूँ,
अबला नहीं सबला हूँ मैं सुन
बांधो मत गाम्भीर्य-उपहास को...
समय बदल गया है साथी,
गूंज रही अनुपम प्रभाती,
मान्यताओं की लाशों से तुम
बांधो मत श्वास-निश्वास को....
अंधी बनी कभी गांधारी,
बदल गयी आज की नारी,
तट से तुम तट को बांधो पर
बांधो मत सरि प्रवाह प्रभास को..
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