उद्घोष !
# # #
है विकास की हन्ता
तेरी यह
मरघट सम
अनुशासन की
परिभाषा,
सुन
सतत विद्रोह करेगी
गति की
चिर अभिलाषा !
क्या बना सकेगी
बंदी मुझको
तेरी खींची
यह वक्र सी
लक्ष्मण रेखा,
बता मुझे
आदेशों पर
क्या कभी किसीने
संयम पलते देखा !
नस नस में मेरे
होता है
जीवन का
अद्भुत नर्तन,
होता सहज
स्वाभाविक
मेरा प्रत्येक
नवीन
परिवर्तन !
साहस शौर्य से
बची हुई मैं
है निष्प्रभाव
तेरा यह शोषण,
जितना क्रूर
नियंत्रण होगा,
तीव्र होता रहेगा
मेरा संवर्धन !
प्रवाह मेरा
ना बाधित होगा
तेरे दुष्कृत्यों से,
आ सामने आ
रणक्षेत्र रचा है,
होगा क्या तेरे
भृत्यों से !
No comments:
Post a Comment