बहता जल नहीं रुकता है !
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बहता जल नहीं रुकता है !
विषम खाई या कोई जंगल
नीर नहीं करता है अंतर
रिक्त यदि मिल जाता कोई
आगे बढ़ जाता है भर कर,
अपनी मौज में बढ़ता है,
सच में नहीं वो झुकता है,
बहता जल नहीं रुकता है !
पतन प्रत्येक बन जाता
उसकी द्रुत गति का हेतु,
तैर नहीं पाते हैं जो
अपना लेते हैं सेतु,
सागर डाल कर लहर-गलबहियां
पहनाता मणि मुक्ता है,
बहता जल नहीं रुकता है !
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