Saturday, 2 August 2014

दोहरा दो ना ...(मेहर)

दोहरा दो ना 
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दोहरा दो ना 
गीतों के 
वो बोल
गा कर 
सुन कर 
जिन को 
खुश  
होते थे 
हम और
आलम 
मस्ती में 
दिल खोल. 
दोहरा दो ना 
गीतों के 
वो बोल....

गहराई में 
डूब चुकी में,
विस्मृत 
मुझ को
कूल,
छेड़ के तान 
पुरानी 
सजना
दूर करो यह 
भूल,
लहरा कर 
वो पद गीतों के 
हो गये जो 
अबोल,
दोहरा दो ना 
गीतों के 
वो बोल...

मेरी सुधि का 
पंछी तो 
भटक गया है
सरगम के 
आकाश में,
पगला हो कर 
झूम रहा है
उस मीठे
एहसास में,
लौटा दो ना 
प्रीतम
वो सपने सब 
अनमोल, 
दोहरा दो ना 
गीतों के 
वो बोल...

दोहरा दो ना 
गीतों के 
वो बोल,
गा कर 
सुन कर 
जिन को,
खुश  
होते थे 
हम और
आलम,
मस्ती में 
दिल खोल,
दोहरा दो ना 
गीतों के 
वो बोल.....

(कविता मन को एक्सप्रेस करने क जरिया है, कभी कभी नियम-कायदों से परे हो कर कहा जाता है, खो कर...इसलिए इस कविता में बहुत सी पुनारावृतियां हैं, इसे रचना का  सौन्दर्य समझ कर अपनाएँ.)  

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