Saturday, 2 August 2014

देखा था मैं ने...(मेहर)

देखा था मैं ने...
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देखा था
मैं ने
नाम सद्भावना के 
दुर्भावना को 
फलते...

देखा था
मैं ने 
धर्म के नाम
वैमनष्य को 
आँखें लाल
दिखाते....

देखा था
मैं ने 
नाम प्रेम के 
छलावे को 
नाचते गाते...

प्रातः की 
मधुर बेला में 
हंस के खिले थे 
फूल,
देख  उन को
हँसते मुस्कुराते
हुए थे कुंठित 
शूल,
द्वेष को 
पहना
चोगा दर्शन का, 
किया गया 
हँसने को
प्रतिपादित 
एक अक्षम्य 
भूल,
देखा था 
मैं ने 
सांझ ढले 
मुरझाये फूल को
अपनी डाल से  
गिरते
किन्तु 
निर्दय शूल को
लगे डाल के  
चुभते...

दीप जला था 
उसी शाम को,
देखा था 
मैं ने 
अडिग समाधिस्थ 
सहृदय 
निष्काम को,
पवन ह्रदय 
पाप था 
समाया,
बहाना 
ताप हरने का
बनाया,
देखा था 
मैं ने 
दीप को 
कांपता सा  
बुझते 
किन्तु 
अवशेष सी 
राख  को 
उड़ते...

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