Saturday, 2 August 2014

अंतर मंथन ! (मेहर)

अंतर मंथन !
(मेरे संग्रह में यह एक कविता रखी है, जिसे मैं कई बार पढ़ती हूँ. रचनाकार का नाम नहीं दे रही, बस रचना की गहराई में उतरियेगा.)

क्षमा करूँगा 
स्वयं 
स्वयं को,
पहले मैं 
पछता लूँ !

क्षमा किया 
तुम ने तो 
मुझ को
पर यह क्षमा 
अधूरी,
किया ना 
दण्डित 
मुझे
हो गयी 
मेरी पीड़ा 
गहरी,

समझ लिया 
तू ने 
अपने को
मैं निज को 
समझा लूँ !

करुणा कितनी 
अकरुण होती
इसे आज ही 
जाना,
बाध्य किया 
अंतर मंथन को
मैं ने स्व 
पहचाना,

तू अपने को 
प्राप्त हो गये
मैं अपने को 
पा लूँ !

तुम ने दिया 
अमूल्य लगा तब 
मैं निर्मूल्य निरर्थक,
मूल्यों को ही 
समझ रहा था
मैं जड़ 
सब कुछ 
अब तक,

दृष्टि मुझे दी 
उस ने अपनी,
अंध दृष्टि 
उजला लूँ !

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