परवाह...
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नहीं होती
कोई रीत
प्रीत की,
मोहब्बत नहीं
कोई बाज़ी
हार-ओ-जीत की !
देखो ना
चांदनी लिपट रही
अँधेरे से,
मिटा कर
खुद को
रात मिल रही
सवेरे से !
खुशबू
सिमट
साँसों में
बस सांस
बन जाती,
आज़ाद
आवाज़
सपेरे की,
होकर कैद
बीन में
गीत बन जाती !
दरिया भी
पतवार से दब
नाव को
आगे बढ़ाती,
माटी
तप कर अलाव में
खुद दीप
बन जाती !
समाता है
ख्वाब भी
मेरी इन बन्द
आँखों में
बेपरवाह,
बता क्यूँ करूँ
मैं साजन
तेरे तगाफुल की
परवाह !
तगाफुल=उपेक्षा/उदासीनता
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