Saturday, 2 August 2014

परवाह...(मेहर)

परवाह...
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नहीं होती 
कोई रीत 
प्रीत की,
मोहब्बत नहीं
कोई बाज़ी
हार-ओ-जीत की !

देखो ना 
चांदनी लिपट रही
अँधेरे से,
मिटा कर 
खुद को 
रात मिल रही 
सवेरे से !

खुशबू 
सिमट 
साँसों में
बस सांस 
बन जाती,
आज़ाद 
आवाज़ 
सपेरे की,
होकर कैद
बीन में
गीत बन जाती !

दरिया भी
पतवार से दब
नाव को
आगे बढ़ाती,
माटी 
तप कर अलाव में
खुद दीप
बन जाती !

समाता है 
ख्वाब भी
मेरी इन बन्द 
आँखों में 
बेपरवाह,
बता क्यूँ करूँ
मैं साजन 
तेरे तगाफुल की
परवाह ! 

तगाफुल=उपेक्षा/उदासीनता 

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