बागबां..
# # #
नहीं मंज़ूर
हमको
ओ बागबां
महज़
होना तुम्हारा
खातिर हमारे..
हम तो यूँ ही
खिलते हैं
सदा
बिन तेरे,
लगाया है
चमन तू ने
घेर कर
काँटों की बाड़ से
बना कर
क्यारियां
करके मुक़र्रर
वक़्त
सिचाई और निराई का,
पाल कर हम को
पाबंदियों में
कैसा यह
ख़याल तेरा
हम हैं बदौलत तेरे.
अरे !
खिलना तो है
फ़ित्रत हमारी,
खिलेंगे
मुस्कुराएंगे
हर दम
रहे ना रहे तू भी...
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नहीं मंज़ूर
हमको
ओ बागबां
महज़
होना तुम्हारा
खातिर हमारे..
हम तो यूँ ही
खिलते हैं
सदा
बिन तेरे,
लगाया है
चमन तू ने
घेर कर
काँटों की बाड़ से
बना कर
क्यारियां
करके मुक़र्रर
वक़्त
सिचाई और निराई का,
पाल कर हम को
पाबंदियों में
कैसा यह
ख़याल तेरा
हम हैं बदौलत तेरे.
अरे !
खिलना तो है
फ़ित्रत हमारी,
खिलेंगे
मुस्कुराएंगे
हर दम
रहे ना रहे तू भी...
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