प्रतिचिन्ह..
# # #
सूखा
सरोवर
तल में
सूखी हुई
माटी ही माटी,
अंकित किन्तु
प्रतिचिन्ह
लहरों के,
मानो
घड़ दी को
कोई मूरत
तरलता की,
देकर नाम
परम्पराएँ
शास्वत मूल्य
संस्कृति
और
सभ्यता...
जीये जा रहे है
हम
वर्तमान में
विगत की
छवियों को,
लादे हुए
बौझा
अवसित
बातों का
बिना जाने सोचे
उपयोगिता
उनकी
अपनी देह
और
आत्मा के लिए...
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सूखा
सरोवर
तल में
सूखी हुई
माटी ही माटी,
अंकित किन्तु
प्रतिचिन्ह
लहरों के,
मानो
घड़ दी को
कोई मूरत
तरलता की,
देकर नाम
परम्पराएँ
शास्वत मूल्य
संस्कृति
और
सभ्यता...
जीये जा रहे है
हम
वर्तमान में
विगत की
छवियों को,
लादे हुए
बौझा
अवसित
बातों का
बिना जाने सोचे
उपयोगिता
उनकी
अपनी देह
और
आत्मा के लिए...
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