क्या प्यार किया था तुम ने ?
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कभी किसी से मूढ़ बता क्या प्यार किया था तुम ने ?
देह की प्यास बुझाई तुम ने,
निज स्वार्थपरता रचाई तुम ने
प्रेम नहीं है स्वाद चर्म का
विषय प्रेम है ह्रदय मर्म का
रीझ स्वयं पर स्वयं का ही श्रृंगार किया था तुम ने,
कभी किसी से मूढ़ बता क्या प्यार किया था तुम ने ?
प्यार नहीं व्यापार है सुन ले
जगत व्यवहार नहीं है सुन ले,
गंतव्य थकन यहाँ अनजाने
नहीं इति बस अथ के माने
सुख के राही कायर कब दुःख अंगीकार किया था तुमने
कभी किसी से मूढ़ बता क्या प्यार किया था तुम ने ?
चाह देहयष्टि आकर्षण की हो तो
रबड़ के तुम पुतले लेलो
मन चाहे तब तौड़ गिराओ
जब तब तुम उनसे यूँ खेलो
लाशों का अनुभव क्या कभी, प्रतिकार किया था तुम ने
कभी किसी से मूढ़ बता क्या प्यार किया था तुम ने ?
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कभी किसी से मूढ़ बता क्या प्यार किया था तुम ने ?
देह की प्यास बुझाई तुम ने,
निज स्वार्थपरता रचाई तुम ने
प्रेम नहीं है स्वाद चर्म का
विषय प्रेम है ह्रदय मर्म का
रीझ स्वयं पर स्वयं का ही श्रृंगार किया था तुम ने,
कभी किसी से मूढ़ बता क्या प्यार किया था तुम ने ?
प्यार नहीं व्यापार है सुन ले
जगत व्यवहार नहीं है सुन ले,
गंतव्य थकन यहाँ अनजाने
नहीं इति बस अथ के माने
सुख के राही कायर कब दुःख अंगीकार किया था तुमने
कभी किसी से मूढ़ बता क्या प्यार किया था तुम ने ?
चाह देहयष्टि आकर्षण की हो तो
रबड़ के तुम पुतले लेलो
मन चाहे तब तौड़ गिराओ
जब तब तुम उनसे यूँ खेलो
लाशों का अनुभव क्या कभी, प्रतिकार किया था तुम ने
कभी किसी से मूढ़ बता क्या प्यार किया था तुम ने ?
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