अनकही...
# # #देह होती है इस लोक में
आत्मा को मिला एक वाहन
पावन बनाने उसको
प्रभु का दिया एक साधन..
असंभव है देह की उपेक्षा कर
आत्मा को जगा पाना
वासनाओं का दमन कर
विकारों को भगा पाना..
दृष्टि में सम्यक्तव का
नाम ही तो प्रेम है,
अपना लेना समग्र किसी को
होता स्वयं प्रेमातिरेक है ..
दिए है तुमने केवल शब्द
अपनी दमित भावनाओं को
प्रकटा है सर्वदा तुम ने
अपनी अतृप्त वासनाओं को...
प्रेम की गहराई नहीं होती
थोथी घोषणाओं की मोहताज़,
मधुर गान लगता हैं कर्णप्रिय
यदि ना भी हो वाद्य और साज...
प्रेम के नाम तू ने की है
हरक़तें बड़ी घिनौनी
शब्दों के ये जाल बताते
प्रवृति तेरी है कितनी बौनी...
आध्यात्म के बहुरूप से तूने
चाहा है कितनो को छलना
शैय्या में बदल जाता है
कब कैसे तेरे घर का पलना..
नारी को समझता है तू दासी
एक भोग्या आधीन तेरी
दूषित मनोवृति ऐसी तेरी
स्वीकारती नहीं,ज़मीर मेरी..
(कृपया ज़मीर शब्द के स्थान पर कोई हिंदी का शब्द सुझाएँ)
______________________________ ____
ये बन्द मेरे नहीं मेरी एक फ्रेंड के लिखे हैं :
तेरी नज्मो में कहता है तू
बातें वो घिसी पिटी पुरानी,
मेरी तसवीरों पर बोलती है
तेरी अंधी हुई हुई वीरानी...
झूठे शिकवों के मर्सिये
बेवज़ह पढ़े फातिहे है बेमानी
मत दोहरा ए ज़ालिम तू
हुई है ख़त्म जो कहानी..
# # #देह होती है इस लोक में
आत्मा को मिला एक वाहन
पावन बनाने उसको
प्रभु का दिया एक साधन..
असंभव है देह की उपेक्षा कर
आत्मा को जगा पाना
वासनाओं का दमन कर
विकारों को भगा पाना..
दृष्टि में सम्यक्तव का
नाम ही तो प्रेम है,
अपना लेना समग्र किसी को
होता स्वयं प्रेमातिरेक है ..
दिए है तुमने केवल शब्द
अपनी दमित भावनाओं को
प्रकटा है सर्वदा तुम ने
अपनी अतृप्त वासनाओं को...
प्रेम की गहराई नहीं होती
थोथी घोषणाओं की मोहताज़,
मधुर गान लगता हैं कर्णप्रिय
यदि ना भी हो वाद्य और साज...
प्रेम के नाम तू ने की है
हरक़तें बड़ी घिनौनी
शब्दों के ये जाल बताते
प्रवृति तेरी है कितनी बौनी...
आध्यात्म के बहुरूप से तूने
चाहा है कितनो को छलना
शैय्या में बदल जाता है
कब कैसे तेरे घर का पलना..
नारी को समझता है तू दासी
एक भोग्या आधीन तेरी
दूषित मनोवृति ऐसी तेरी
स्वीकारती नहीं,ज़मीर मेरी..
(कृपया ज़मीर शब्द के स्थान पर कोई हिंदी का शब्द सुझाएँ)
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ये बन्द मेरे नहीं मेरी एक फ्रेंड के लिखे हैं :
तेरी नज्मो में कहता है तू
बातें वो घिसी पिटी पुरानी,
मेरी तसवीरों पर बोलती है
तेरी अंधी हुई हुई वीरानी...
झूठे शिकवों के मर्सिये
बेवज़ह पढ़े फातिहे है बेमानी
मत दोहरा ए ज़ालिम तू
हुई है ख़त्म जो कहानी..
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