चित्र मरण का.....
# # #
डूबोकर
जीवन रंग में
श्वास की
सजग तूलिकाएं
अंकित करूँगी
चित्र मरण का.....
पांडाल दो है
निशा और दिन के,
दीप
सुख-दुःख के
बालूँगी दोनों में,
सिमट जाउंगी
आंसुओं में
बिखर कर मैं
हंसिंयों में,
ध्येय को
बढती रहूंगी
करके समर्पण
क्षण प्रतिक्षण का....
गर थक गयी मैं
जागने से
नींद की मय
पी डालूंगी,
यदि सत्य
नीरस हुआ तो
ख्वाबों से भी
मैं खेलूंगी,
अवदान
देती जाउंगी मैं
चित्र को
निज प्रत्येक कण का..
होगा सम्पूर्ण चित्र
जिस पल
थम जाएगी
तुलिका भी
स्वयं,
हो जायेगा
पूर्व उसके
किन्तु तिरोहित
चपल स्फीत अहम्,
अचिर से चिर
बन कर मैं
पाउंगी
प्रतिदान
प्रण का...
(स्फीत=फूला हुआ, inflated )
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डूबोकर
जीवन रंग में
श्वास की
सजग तूलिकाएं
अंकित करूँगी
चित्र मरण का.....
पांडाल दो है
निशा और दिन के,
दीप
सुख-दुःख के
बालूँगी दोनों में,
सिमट जाउंगी
आंसुओं में
बिखर कर मैं
हंसिंयों में,
ध्येय को
बढती रहूंगी
करके समर्पण
क्षण प्रतिक्षण का....
गर थक गयी मैं
जागने से
नींद की मय
पी डालूंगी,
यदि सत्य
नीरस हुआ तो
ख्वाबों से भी
मैं खेलूंगी,
अवदान
देती जाउंगी मैं
चित्र को
निज प्रत्येक कण का..
होगा सम्पूर्ण चित्र
जिस पल
थम जाएगी
तुलिका भी
स्वयं,
हो जायेगा
पूर्व उसके
किन्तु तिरोहित
चपल स्फीत अहम्,
अचिर से चिर
बन कर मैं
पाउंगी
प्रतिदान
प्रण का...
(स्फीत=फूला हुआ, inflated )
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