Saturday, 2 August 2014

मुझे बसा लो ना...(मेहर)

मुझे बसा लो ना...

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नहीं वांछा
कुछ भी अब
मुझको,
करूँ एक
अनुनय मैं
तुझको,
अपने अंतर के
प्रासाद में
मुझे बसा लो ना...

मैं सपना
बन कर
रहूँगी साजन,
ना मिले मुझे
पत्थर का
आँगन,
अपने नयनों की
घनता में
मुझे बसा लो ना...

मैं भाषा
तुम गहन मौन हो,
मैं जानूं
तुम,
मेरे कौन हो,
अपनी जिह्वा का
शब्द
बना कर
मुझे बसा लो ना....

मैं प्यासी
तुम स्रोत
अमृत के,
मैं विरक्त
तुम भाव
तृप्त के,
अपने उर की
प्यास
बना कर
मुझे बसा लो ना...

मैं अपूर्ण
तुम साक्षात्
सम्पूर्ण हो,
मैं हूँ खिन्न
तुम स्वतः
स्फुरण हो,
अपने अधरों की
स्मिति
बना कर
मुझा बसा लो ना...

नहीं वांछा
कुछ भी अब
मुझको,
करूँ एक
अनुनय मैं
तुझको,
अपने अंतर के
प्रासाद में
मुझे बसा लो ना...

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