Sunday, 30 September 2018

पूजारन : विजया



पुज़ारन
++++

पुज़ारन हूँ मैं तो सनम तेरे बाग़ों की बहार की
नयनों को फूल लगती चुभन तेरे हर खार की,

सोचा किए हैं हर लम्हा जो बिता है संग उनके
ये ज़िंदगी कुछ नहीं, मदहोशी उनके ख़ुमार की.

राहत से भी बढ़कर है तमन्ना उस राहत की
दिल गिनता रहता यूँ घड़ियाँ तेरे इंतज़ार की.

हसरत है कुछ बाक़ी मेरी क़यामत के दिन को
मिली हैं मुझे एक शमा बुझी अपने मज़ार की.

बन कर बाग़बाँ तोड़ते है वो फूल हर चमन के
निकले हैं लूटने जो दुनिया किसी ख़ाकसार की.

क्या जाने वो मुहब्बत के जज़्बा ओ जुनूँ को
मुआफ़िक़ जिन्हें चाहिए हर अदा दिलदार की.

वादा,,,,,


वादा
# # # #
टूटना मेरी
नींद का था कि
अनजाने से
ख्वाब का
पूछ बैठा था
क्यों नहीं हुआ
अब तक जलवा
यह आफताब
किसी ने कानों में
हौले से कहा
सूरज का
चले आने का
वादा रात से है
नींद और ख्वाब से तो नहीं,,,,

शह और मात : विजया



यह है शह-यह है मात...
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बिछी है बार बार
बिसातें शतरंज की
खेल होता है
हर बार
दिल के सफ़ेद
दिमाग के
काले मोहरों के बीच...

मैं हूँ रानी दिल की
होती हूँ करीब हर लम्हे
मेरे हमदम राजा के
करने को उसकी
परवाह और हिफाज़त,
बिना उसके
मेरा वुज़ूद कहाँ...

जानती हूँ
मेरा राजा भी है
राजा दिल का
बिलकुल पाक
आबे ज़मज़म सा
सफ़ेद कपडे सा
पारदर्शक स्फटिक सा....

खेलता है
कितना सहज और सरल
होशमंद होकर
बढा कर एक कदम
एक वक़्त में
और चलता भी है
ज़िन्दगी की मुश्किल राहों में
नितांत अकेला...

नहीं चाहती
चले अढ़ाई की चाल
एक बार भी कहीं और
अपना लेती हूँ मैं भी
ज़ेहनी चालें
काले मोहरों वाली
जीतने के लिए
सोचना जो होता है
प्रतिद्वन्दी जैसा ही...

बढ़ा देती हूँ
चुनिंदा प्यादे को
कुछ इस कदर
कि बन जाये
वो भी उन जैसा
पहुँच कर उनके ही खेमे में,
और कह दे
काले राजा को
यह है शह
यह है मात..R

दुष्ट आत्माएँ : विजया



दुष्ट आत्माएँ
बियावान जंगल में
खेलती होती है
आग की लपटों से,
चल देता है
भटका बहका मुसाफ़िर
पाले हुए मतिभ्रम
कि मिलेगा प्रकाश वहाँ !

ख़ाली बोतल में.....,

छोटे छोटे एहसास
===========

'सर्व' होता रहा
गंदा पानी
किसी नल का
भरा जा कर
'Himalayan'* की
ख़ाली बोतल में.....

~~~॰~~~

*Himalayan Natural Mineral Water (an inyernational brand) is a naturally balanced mineral water, never touched by human hands,sourced directly from the Shivalik Range in the Himalayan Mountains.

बादलों की ओट में.....



बादलों की ओट में
खो जाना फिर से
चाँद का
प्यासी नज़रों का ढूँढते रहना
चंद अल्फ़ाज़
बात अपनी कहने को,
वो ही जगहें
वो ही राहें
वो ही फ़िज़ाएँ
नहीं दिख रहा था
तो बस चाँद का अक्स
गहरी झील के
हरे हरे पानी में,,,,,

अनगिनत अक्स....



बिखरा था खुल कर
आइना
कुछ इस क़दर
अक्स मेरे
एक से
अनगिनत हो गए,,,,