Saturday, 18 November 2023

खोया हुआ महबूब...

 खोया हुआ महबूब 

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बरसों के अंतराल के बाद 

छुआ है तुम को 

कितने बदल गये हो,

कहाँ गया कच्चापन-अधूरापन 

नहीं नज़र आ रहा है वो अल्हड़पन !!


दिख रहा है सब कुछ सुघड़ सा 

सजा धजा सा

कंसीलर ने ना जाने क्या क्या छुपा दिया है 

यह सीरम, फाउंडेशन और उस पर 

ज्यूँ परत हो फेस क्रीम की 

पूरी देह पर जैसे 

गहरा बॉडी लोशन मल लिया है 

वैक्सिंग, मैनीक्योर,पेडि-क्योर ने 

स्मूथ कर दिया है सब कुछ 

हेयर स्टाइल बिलकुल बदल गई है 

ऑई लाइनर ने आँखों की गहराई बढ़ा दी है 

लिप-कलर ने ज्यूँ होठों में जान भर दी है 

उभारों को सुडौल दिखाने 

ज्यूँ पैडेड सपोर्ट पहना है 

एक अपरिचित सी तेज़ गंध फूट रही है बदन से

शहरी बाबूओं की नज़रों में 

सेक्सी हो गये हो तुम

लेकिन मैं ठहरा गवईं, 

मुझे तो लग रहे हो तुम 

एक सजी सँवरी बेजान मूरत से 

सच कहूँ नितांत अजनबी से लग रहे हो तुम !!


अचानक दिल में एक टीस सी उठी है 

आँखों से पैनाले बह चले हैं 

तुम हाँ तुम....कोई और हो

खोज रहा हूँ मैं तो 

अपने खोये हुए महबूब को !!


(महबूब से मतलब अपने गाँव से है)

मैं हूँ राधा : विजया

 मैं हूँ राधा...

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मैं हूँ प्रेम की पूर्ण परिभाषा 

मैं हूँ प्रेम की आबोली अनलिखी भाषा...


मैं हूँ राधा,

मैं नहीं हूँ आकर्षण 

रूप और यौवन का 

ना हूँ मैं पिपासा अधरों की 

ना ही मैं रसिक का रास हूँ 

ना हूँ मैं कोई मूरत माटी की 

ना ही मोहताज 

किसी परिपाटी की...


कान्हा !

मैं तो हूँ अंदर तुम्हारे

बाहर कहाँ ?

कहाँ हूँ मैं अलग तुम से 

झांको ज़रा

मैं हूँ समायी तुझ में

देखोगे तुम यदि बाहर 

पाओगे बिछुड़ी हूँ तुम से मैं...

ऐसे में मेरे कान्हा !

कैसे समेटोगे मोहे 

अपनी बाहों में ?


कान्हा !

दूर हो कर भी 

तुम्हारे सब से पास हूँ 

मैं तो तुम्हारी श्वास-निःश्वास  हूँ 

तुम्हारे अश्रु हूँ, तुम्हारा मृदु हास हूँ 

मैं तुम्हारे हृदय की एकाकी आस हूँ....


कान्हा !

मैं ही तुम्हारी तन्हाई हूँ 

मैं तो तुम्हारी परछाई हूँ 

तुम्हारे सभी संबंधों में गौण हूँ 

मैं तो बस एक चिर मौन हूँ 

तभी तो प्रश्न यह अबूझ 

जिह्वा पर सब के 

मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ ?

Monday, 2 October 2023

भीतर और बाहर

 भीतर और बाहर 

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सत्य जीवन के 

नहीं पाए जा सकते हैं बाहर 

तारों और ग्रहों के विस्तृत अध्ययन में 

वे तो समाये होते हैं 

हमारे ही भीतर की गहराइयों में 

हमारे हृदय की शोभा में  

मस्तिष्क की शान में 

और आत्मा की भव्यता में,

नहीं समझ पाते हैं हम जब तक 

क्या बसा है हमारे अंतर में 

नहीं जान पायेंगे हम 

विषय बाहर के...

कौन थी राधा : क्या थी राधा

 कौन थी राधा : क्या थी राधा 

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नहीं थी राधा कोई दैहिक स्त्री 

प्रतीक थी वह तो कृष्ण भाव की...


स्त्री अंग होता है प्रत्येक पुरुष में 

और पुरुष अंग प्रत्येक स्त्री में 

मनोभावों में भी होता प्राबल्य 

स्त्रेण और पुरुषैण भावों का 

तथ्य हैं ये जैविकी और मनोविज्ञान के...


कुछ ऐसा ही 

नैसर्गिक और आत्मिक संबंध था वह 

नैतिक अनैतिक  मानदंडों से हटकर 

ना हो सकता है यह घटित 

पति पत्नी के बीच 

ना ही बॉय फ़्रेंड और गर्ल फ़्रेंड के बीच 

यह ना तो शारीरिक है ना ही भावात्मक 

इसीलिए तो समा जाता है इसमें 

व्यक्तिव का हर तल...


यदि देखें दक्षिण से वाम को 

राधा पढ़ी जाएगी धारा, 

बहती है भाव धारा 

यदि उच्च से निम्न को 

मिले होते हैं विकार उस में 

और बहती है धारा जब निम्न से उच्च को 

हो जाती है विशुद्ध होकर राधा

समा गई थी 

ऐसी संपूर्ण राधा कृष्ण में...


माँगता है आज का पुरुष भी वही समर्पण 

क्या बन सकती है आज कोई राधा ?

किंतु पूछती हूँ मैं 

क्या कोई कृष्ण है कहीं ?

सहोदरी...


सहोदरी 

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सहोदरी !

मेरी प्यारी दीदी!

पहली बारिश की रिमझिम है 

मन भी हुआ मयूर सम है 

अन्दर बाहर झम झम है 

दिल चाहे नाचना छम छम है 

मेह नेह बन बात करे 

बिजली चमक झंकार करे 

बादल बजा रहे ढोल नगारे

पाँव थिरकते धुन पर सारे 

जल में कमल खिल खिल रहे हैं 

धरती आकाश मिल मिल रहे हैं 

प्रकृति ख़ुशी से बरस रही है 

देखो हरियाली सरस रही है 

चलो ना,

चलो ना

सहोदरी !

मेरी प्यारी दीदी !

मोर बनी थंगट करें

मोर बनी थंगट करें...


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नोट्स :


१-फ़्रेंच पेंटर William-Adolphe Bouguereau (1825-1905) की A Little Coaxing" title की डबल पोर्ट्रेट पेंटिंग है. इसमें दो बहने हैं. Coaxing का अर्थ है मीठी मीठी बातें करके मनाना.

कविता में छोटी बहन, बड़ी बहन को मना रही है, dance के लिए.  


२-थंगट  या थंगाट गुजराती नृत्य है जिसमें गरबा और डांडिया नृत्य होते हैं.  थंगट पहली बारिश में मोर सा नाचना है उल्लास और ऊर्जा के साथ.


माटी का पुत्र : विजया

 लाल बहादुर शास्त्री जी की जन्म जयंती पर 

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माटी का पुत्र 

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क्यों चल दिया अचानक 

धरा विदेशी पर 

आज ही रहस्य है,

जो भी किया वह है ज़ाहिर 

ठोस, अनुपम और दूरगामी 

आज भी अनुकरणीय है...


क़द काठी छोटी थी

तो क्या हुआ 

इरादे बुलंद थे 

हरा दिया था दुश्मन को 

सोच और निर्णय 

उनके स्वच्छंद थे...


भूख मिटाने का 

संकल्प भी कितना 

गहरा था 

"जय जवान जय किसान" का उद्घोष 

सुनहरा था...


हमारा यह द्वितीय प्रमुख 

जिसने पाया था अल्प कार्यकाल 

भारतीयता से ओतप्रोत था 

माटी का यह पुत्र 

प्रेरणा का अविरल स्त्रोत था...

Sunday, 10 September 2023

बोथ वे ट्रैफिक : विजया

 बोथ वे ट्रैफिक....

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खूब सुने हैं "सरमन"

पढ़ा, जाना और समझा भी है 

गूढ़ ज्ञान उस ऊँचे वाले प्रेम का 

जो हुआ करता है 

अप्रयास,अपेक्षा रहित सहज नैसर्गिक...


नहीं इनकार मुझे 

इस पावन भाव से 

जो अलौकिक है,दिव्य है, 

और है परम पवित्र,

होता है जो घटित 

पूर्णत: मुक्त हो जाने पर 

हमारे मोह माया लोभ अहंकार से 

किंतु लग जाती है उम्रें ऐसा हो जाने में 

तो क्या नहीं पियें हम यह अमृत 

क्या नहीं जियें हम इस दिव्यता को ?


हमारे आपसी रिश्तों में 

अपना सकें हम यदि निश्छल प्रेम 

बदल जाएगा अन्दाज़ रिश्तों को जीने का,

बेहद ज़रूरी है रिश्तों में होना 

प्यार के एहसास की नमी का 

रेत भी हो ग़र सूखी 

तो निकल जाती है वह मुट्ठी से...


मेरे दोस्त सुन !

रिश्तों में अकड़ नहीं,

चाहिए होती है पकड़

एहसासों में महसूस होती है जो अदृश्य सी 

जिसे कह सकते हैं थामना...

हाथों में हाथ देकर या लेकर आग़ोश में 

तकलीफ़ में साथ देकर 

लड़खड़ाने पर संभाल कर 

या दे कर  कंधा अपना 

ताकि कर सके कोई बौझ हल्का दिल का...


और "वन वे" नहीं,

यह होना चाहिए "बोथ वे"

ताकि ज़िंदगी का ट्रैफिक 

बिना किसी ब्लॉकेज के 

चल सके लगातार,

बात सिर्फ़ आपसी व्यवहार की है 

जो मानवीय है,ज़मीनी है, 

किताबी या अपवाद सा नहीं...