Sunday, 29 December 2024

निमिष निमिष

 निमिष निमिष 

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छद्म सी अनुभूति ही तो है विगत 

पद चिह्न है मात्र 

छूटे हुए रेत पर  

बस एक  लकीर है 

खींची हुई निहायत सूखी बालू पर

सांप तो कब का गुज़र गया 

और ना जाने कहाँ चला गया

पीटे जा रहे हैं हम बस लकीर को,,,,


जीते जा रहे हैं हम मगर 

चिपक कर उसी विगत से

नहीं रहा है जिसका कोई अस्तित्व 

क्यों ना कह दें हम स्वयं से 

बीत गई सो बात गई,,,,


जो ज्ञात वह : विगत 

जो अज्ञात वह : भविष्य,

बनाकर बिम्ब विगत का

खींच दिया है हमने 

खाका भविष्य का 

कल्पना की लकीरों में 

भर दिए हैं रंग उसमें 

लेकर उधार  विगत से,

भला कैसे बना सकेंगे हम 

रूपरेखा उसकी 

जो अज्ञात है मूल में ?


छोड़कर विगत और भविष्य में जीना 

जिया जाय वर्तमान में 

होकर उत्साहित 

होकर प्रसन्न

होकर आनंद चित्त 

होकर तल्लीन

निमिष निमिष,,,,


कल का आज ही तो 

आज का भविष्य 

कोई भी आज 

अच्छा जिया हुआ 

पूरा जीवन अच्छा जिया,,,,


__________________________


योग वशिष्ठ पर सुरेश बाबू की प्रस्तुति और उस पर विजय भाई साहब और रोबिन के कमेंट्स पढ़ कर मेरी कलम भी तनिक मचल गई, और घटित हुई यह प्रस्तुति जो

योग वशिष्ठ के इस श्लोक से प्रेरित है : 


भविष्यं नानुसन्धत्ते नातीत चिन्तयत्यसौ।

वर्तमान निमेष तु हसन्नेवानुनर्तते।।


'भविष्य का अनुसंधान नहीं, न अतीत की चिन्ता, हंसते हुए वर्तमान में जीना.'

Monday, 17 June 2024

चार द्वार

 चार द्वार 

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अयोध्या में व्याप्त शांति और शांत चित्तता के मध्य 

कुंवर राम ने देखे थे निशान दुख के जन मानस में,

सोचते थे राम :


क्या अर्थ है उस जीवन का जो भरा हुआ हो दुखों से ?

कैसे हुआ जाय मुक्त जीवन के गमनागमन की पुनरावृत्तियों से ?

क्या संभव है मोक्ष और कैसे ?


पिता दशरथ की आज्ञा ले कर ऋषि विश्वामित्र ले आये थे राम को सप्तऋषियों में एक ऋषि वशिष्ठ के पास जिन से राम को जीवन का मार्गदर्शन मिला. 


वशिष्ठ और राम के इस संवाद में गहन दार्शनिक विवेचन और संकेत थे जिन को राम ने अपनाया. ऋषि वाल्मिकी ने इस संवाद जिसे "योग वशिष्ठ" कहा जाता है उसकी केंद्रीय थीम को लिपिबद्ध किया.


मैं इस संवाद की अपने लिए अपनी समझ को शेयर कर रहा हूँ. ना तो यह किसी शास्त्र की व्याख्या है ना ही कोई शब्दानुवाद या भावानुवाद. बस अपने को एक स्वान्तः सुखाय संबोधन. जिसको जितना अनुकूल लगे अपना ले अन्यथा इग्नोर कर दें. 💚💜❤️🙏


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आत्मबोध तक पहुँचने हेतु 

गुजरना होगा चार द्वारों से :


शांति 


संतोष 


सत्संग 


स्व-चिंतन 


पहला द्वार : शांति 

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शांत है जिसका मन 

होता है वह स्वतंत्र द्वन्दों से :

यथा पसंद-नापसंद,लगाव-दुराव,

सुख दुख...


बने रह कर होशमंद 

अपनाते हुए साक्षी भाव 

ला सकता है मानव 

संतुलन और समग्रता 

अपनी मनःस्थितियों में,

हो सकता है योग और ध्यान एक नुस्ख़ा 

शांत मनस्थिति हासिल करने का...


दूसरा द्वार : संतोष 

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पा लें प्रसन्नता संतुष्टि में,

नहीं है चिर आनंद अर्जन और संग्रहण में 

आनंद है अनावश्यक के विसर्जन में 

सर्वोत्तम है रहना संतुष्ट 

'जो कुछ है पास अपने' से...


उचित है होना उमंगी 

अपने उच्च लक्ष्य को पाने को

किंतु नहीं है प्रसन्न हम 

जो पहले से प्राप्त है उस से 

और रखते हैं लोभ 

अधिक और अधिक पाने का,

पायेंगे हम कुछ भी नहीं 

सिवा अफ़सोस के...


तीसरा द्वार : सत्संग 

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साथ सहृदय, संवेदनशील 

सुबुद्धि धारी, सकारात्मक, रचनात्मक लोगों का 

करता है मुक्त मतिभ्रमों से 

आती है जागरूकता इस से 

करती है जो प्रशस्त 

मार्ग आध्यात्म का  

पथ स्व-मुक्ति का...


चतुर्थ द्वार : स्वचिंतन 

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यदि लें लौकिक अर्थों में 

करना निरंतर अवलोकन 

स्वयं के विचारों और कलापों का 

करते रहना संशोधन कस कर उन्हें

उपयुक्त-अनुपयुक्त की  कसौटी पर 

कहा है लिन यूतांग(*) ने :

मिटाते रहो व्यर्थताओं को...


देखें यदि आध्यात्म की दृष्टि से 

अवलोकन में अंतर्निहित होगा :

उतरना अंतर की गहराई में 

करते हुए जिज्ञासा : कौन हूँ मैं ?

मिलेगा उत्तर :

नहीं हूँ मैं देह, ना ही मन 

देह तो होगी समाप्त एक दिन 

मन है गठरी विचारों की 

हम तो हैं अजर अमर आत्मा 

जिसमें निहित है 

चेतना हमारे अस्तित्व की...


(*)

"The wisdom of life consists in the elimination of non-essentials."--Lin Yutang (Chinese/Taiwanese Philosopher)

Monday, 22 April 2024

पुरानी डायरी

 

पुरानी डायरी 

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टटोलते टटोलते 

एक भूले बिसरे दराज को 

मिली है आज एक डायरी पुरानी 

जर्जर हो गई है 

कुतर भी डाला था चूहों ने 

मेरी ख़ुद की ख़रीदी मुफ़लिसी के दिनों में,

जिल्द जैसे घायल जिस्म हो 

युद्ध में लड़े थके फ़ौजी का 

पन्ने उसके पीले और बदरंग 

मेलन्यूट्रिशन, एनीमिया या डिप्रेशन के 

शिकार इंसान की चमड़ी जैसे 

कहीं कहीं टूटे हुए 

और कहीं तो फटे हुए भी 

सूख कर और पुराने पड़कर 

इतने कमज़ोर 

कि पलटने से ही कोई टुकड़ा 

अलग होकर हाथ में आ जा रहा है...


कुछ कुछ सफ़हों में लिखा हुआ 

तो ज़्यादातर ख़ाली 

ख़ाली पन्नों पर ऐसे ऐसे दाग 

किसी  इंसान के बोलते,रोते, हंसते चेहरों से 

या कोई जानवर के अक्स से 

या रेगिस्तान की पीली आँधी से,

बरकरार  है मगर 

गाढ़ी काली स्याही से लिखे हर्फ़

जो दिल और ज़ेहन की हालत 

या नफ़सियाती दौरों के असर से 

कभी खूबसूरत, कभी लड़खड़ाते,

कभी उदास, कभी उदासीन 

कभी चहकते, कभी चिड़चिड़े

कभी थमे हुए तो कभी भगौड़े हैं...


देखे जा रहा हूँ 

इस हासिल को

कर रहा हूँ महसूस 

कभी छूकर, कभी सोच कर 

कह रहा हूँ मन ही मन

"जाने कहाँ गए वो दिन ?"

Wednesday, 22 November 2023

अर्धनारीश्वर : मेहर

 अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस पर 

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अर्धनारीश्वर...

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पा चुका है समर्थन 

विज्ञान और मनोविज्ञान का 

बुनियादी सिद्धांत अर्धनारीश्वर का...


कहानी पौराणिक है 

बाँट दिया था अपनी काया को 

दो हिस्सों में 

ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण के क्रम में,

'का' बना पुरुष 'या' बनी स्त्री 

मनु और शतरूपा 

और 

बने दोनों मूल इस मैथुनी सृष्टि के

उत्पति हुई इस धरा पर मानव की 

दोनों के मेल से...


नहीं है संपूर्ण स्वयं में

अकेला  पुरुष या स्त्री अकेली,

पश्चात अपनी रचना के 

भटक रहा है पुरुष

तलाश में अपने आधे हिस्से की,

आधे हिस्से की उपलब्धि का सुख

टुकड़ों टुकड़ों में

मिलता है उसे कभी मां में

कभी बहन में, कभी प्रेमिका में, 

कभी जीवन संगिनी में 

कभी स्त्री मित्रों में

चैन किंतु फिर भी नहीं...


नहीं मिट पाता है ताउम्र 

यह एहसास अधूरेपन का,

तलाश संपूर्णता की 

पूरी होगी उसके अपने अंदर ही,

महत्वपूर्ण है 

धर्म,अर्थ, काम, मोक्ष से भी...

अपने भीतर के स्त्रीत्व से साक्षात्कार...


पहचान लेगा पुरुष जिस दिन 

अपने भीतर की स्त्री को 

और उतार लेगा अपने जीवन में 

उस जैसा प्रेम, ममत्व, कोमलता और करुणा 

हो जाएगी पूरी तलाश उसकी स्वयं की,

निहित है इसी में 

हल उसके अंतर की ऊहापोह का 

और दुनिया की समस्याओं का भी,

नहीं करनी होगी उसे आकांक्षा  

पृथ्वी से इतर किसी स्वर्ग की

होकर मुक्त हिंसा, क्रूरता और निर्ममता से 

बन जाएगी स्वर्ग स्वयं यह दुनिया...

Saturday, 18 November 2023

मैं हूँ कि तुम हो : धर्मराज भाई


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"मैं हूँ कि तुम हो" बड़ी ही प्यारी सूफियाना नज़्म है धर्मराज भाई की, उस पर ये दो Couplets मैं कमेंट्स में extempore लिख पाया.

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तबर्रुक हो मुबारक 

जल जल कर बुझने वाले,

हिद्दत भी है यक तजुर्बा 

राज ए हसरत छुपाने वाले...


सहारे होते हैं बहाने 

होता मतीन वजूद ही किसी का, 

भटका कोई छड़ी लेकर 

मगर रास्ता था उसी का...


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तबर्रुक=प्रसाद (जैसे मंदिर में मिलता है)

हिद्दत=उग्रता/ ऐंठन/प्रकोप 

मतीन=महत्वपूर्ण, गंभीर 


नज़्म में भी पहले दो अल्फ़ाज़ इस्तेमाल हुए हैं.



मैं हूँ कि तुम हो 

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होके फ़लक सा ओझल 

ज़रा सा ये जो नज़र आता हूँ 

पत्थर के मानिंद 

मैं नहीं हूँ 

तुम्हीं हो 

रख छोड़ा है अनजाने में तुमने खुदी को 

मेरी शक्ल में 

कि एक दिन ज़िंदगी के थपेड़ों ठोकरों से लुढ़कते लुढ़कते 

तुम्हें किसी अनहुए से हुए सहारे की दरकार होगी 


ये जो तुम खूब नज़र आते हो 

मौजे हिद्दत के माफ़िक़ 

मैं ही हूँ जो 

मैं सा बुझकर 

तुम सा धधक उठा हूँ लेकर हुनर बुझन का

कि एक दिन 

चख सकूँ तबर्रुक

तुम होकर भी बुझ चलने का 


मैं तुम हूँ मेरी शक्ल में 

कि तुम मैं ही हो तुम्हारी शक्ल में 

ज़िंदगी का ये राज बयाँ 

कर करके भी क्या ख़ाक करिए 

कभी ये राज बयाँ हो ही न सका होने का 

जो बयाँ हो गया 

कहाँ वो राज फिर राज रहा 


                                        धर्मराज 

                                  02/10/2023

संबंध : आकृति

 सम्बन्ध

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सम्बन्धों में बातें होती है 

एकत्व की, विलय की 

एक प्राण दो देह की 

आत्मिक जुड़ाव की 

और भी बहुत से 

मुहावरे और कहावतें 

किंतु क्या संभव हुआ है 

दो व्यक्तियों का एकमेव हो जाना ?


बहिरंग में देखें तो 

आकार प्रकार अलग 

आँखों की पुतलियाँ अलग 

उँगलियों के निशान अलग 

अंतरंग में देखें तो 

आत्मा अलग 

जीव अलग 

पूर्वजन्म की योनि अलग 

ऋण बंधन और कर्म बंधन अलग....


सम और बन्ध

मिलकर बना है सम्बन्ध

अपेक्षा है सम की 

व्यवहार में 

अनुभूति में 

अभिव्यक्ति में 

मुखर हो या मौन 

किंतु मूल में दीर्घ काल में 

सम को करना होगा मैंटेन 

विषमता है घातक संबंधों के लिए....


आदान प्रदान 

अंडर करंट है संबंधों का 

परस्पर आदर 

एक दूजे को स्पेस देना 

आपसी समझ और सहनशीलता 

सीमाओं की विवेक सम्मत स्वीकृति 

यही तो बनाए रखता है रिश्तों को....


हम तुम एक हैं 

वादा करते हैं ज़िंदगी भर साथ रहेंगे 

हमेशा वफादार रहेंगे 

बहुत सुंदर मिशन स्टेटमेंट 

प्रतिबद्धता, निष्ठा से निबाहना 

ऐक्शन प्लान 

सहजता, अकारणता, प्रयासरहित 

शब्द पलायन है सच से 

एक जाना अनजाना षड्यंत्र 

किसी को टेकन फॉर ग्रांटेड लेने का....


मानवकृत होते हैं सम्बन्ध 

मान भी लें कि ताल्लुक़ है उनका 

जन्म जन्मांतरों से 

लेकिन इन्हें जीना तो होता है हमें 

दिन प्रतिदिन here and now

ठीक वैसे ही जैसे 

ख़ाना पीना, सोना जागना 

साँस लेना, नित्यकर्म पूरे करना 

ड्रेस अप होना, बीमार और स्वस्थ होना 

पढ़ना, अर्जन सृजन विसर्जन करना 

ये सब हम जब सप्रयास करते हैं 

तो रिश्तों में क्या है ऐसा 

जो जारी रह सके बिना श्रम के ?

जय भवानी : आकृति

 "जय भवानी"

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इतिहास गवाह है 

कि बहादुर क्षत्रियों ने 

"जय भवानी" 

उद्घोष संग युद्धों में 

दुश्मन के छक्के छुड़ाए थे...


इतिहास इस बात का भी गवाह है 

क्षत्राणियाँ साक्षात भवानी बन 

आन बान और शान के लिए 

जौहर जी ज्वाला में 

अपनी आहुति हंसते हंसते दे देती थी...


"चुण्डावत माँगी सैनाणी

सिर काट दे दियो क्षत्राणी" की 

कहानी नहीं है अनजानी 

झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई 

आज़ादी की अनुपम दीवानी 

रानी दुर्गावती थी ऐसी वीरांगना

छोड़ी है जिसने अमिट निशानी...


ले ली है करवट समय ने 

बदल गई सारी अवस्थाएँ 

प्रजातंत्र अब देश हमारा 

विगत हुईं राजतंत्र व्यवस्थाएँ 

किंतु हम वीरांगनाओं को 

वही साहस दिखलाना  है 

नारी उत्पीड़न के ख़िलाफ़ 

और 

स्त्री सशक्तीकरण के लिए 

बुलंद आवाज़ उठाना है 

"जय भवानी" की गूंज के साथ 

विजय श्री को पाना है...

खोया हुआ महबूब...

 खोया हुआ महबूब 

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बरसों के अंतराल के बाद 

छुआ है तुम को 

कितने बदल गये हो,

कहाँ गया कच्चापन-अधूरापन 

नहीं नज़र आ रहा है वो अल्हड़पन !!


दिख रहा है सब कुछ सुघड़ सा 

सजा धजा सा

कंसीलर ने ना जाने क्या क्या छुपा दिया है 

यह सीरम, फाउंडेशन और उस पर 

ज्यूँ परत हो फेस क्रीम की 

पूरी देह पर जैसे 

गहरा बॉडी लोशन मल लिया है 

वैक्सिंग, मैनीक्योर,पेडि-क्योर ने 

स्मूथ कर दिया है सब कुछ 

हेयर स्टाइल बिलकुल बदल गई है 

ऑई लाइनर ने आँखों की गहराई बढ़ा दी है 

लिप-कलर ने ज्यूँ होठों में जान भर दी है 

उभारों को सुडौल दिखाने 

ज्यूँ पैडेड सपोर्ट पहना है 

एक अपरिचित सी तेज़ गंध फूट रही है बदन से

शहरी बाबूओं की नज़रों में 

सेक्सी हो गये हो तुम

लेकिन मैं ठहरा गवईं, 

मुझे तो लग रहे हो तुम 

एक सजी सँवरी बेजान मूरत से 

सच कहूँ नितांत अजनबी से लग रहे हो तुम !!


अचानक दिल में एक टीस सी उठी है 

आँखों से पैनाले बह चले हैं 

तुम हाँ तुम....कोई और हो

खोज रहा हूँ मैं तो 

अपने खोये हुए महबूब को !!


(महबूब से मतलब अपने गाँव से है)

मैं हूँ राधा : विजया

 मैं हूँ राधा...

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मैं हूँ प्रेम की पूर्ण परिभाषा 

मैं हूँ प्रेम की आबोली अनलिखी भाषा...


मैं हूँ राधा,

मैं नहीं हूँ आकर्षण 

रूप और यौवन का 

ना हूँ मैं पिपासा अधरों की 

ना ही मैं रसिक का रास हूँ 

ना हूँ मैं कोई मूरत माटी की 

ना ही मोहताज 

किसी परिपाटी की...


कान्हा !

मैं तो हूँ अंदर तुम्हारे

बाहर कहाँ ?

कहाँ हूँ मैं अलग तुम से 

झांको ज़रा

मैं हूँ समायी तुझ में

देखोगे तुम यदि बाहर 

पाओगे बिछुड़ी हूँ तुम से मैं...

ऐसे में मेरे कान्हा !

कैसे समेटोगे मोहे 

अपनी बाहों में ?


कान्हा !

दूर हो कर भी 

तुम्हारे सब से पास हूँ 

मैं तो तुम्हारी श्वास-निःश्वास  हूँ 

तुम्हारे अश्रु हूँ, तुम्हारा मृदु हास हूँ 

मैं तुम्हारे हृदय की एकाकी आस हूँ....


कान्हा !

मैं ही तुम्हारी तन्हाई हूँ 

मैं तो तुम्हारी परछाई हूँ 

तुम्हारे सभी संबंधों में गौण हूँ 

मैं तो बस एक चिर मौन हूँ 

तभी तो प्रश्न यह अबूझ 

जिह्वा पर सब के 

मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ ?

Monday, 2 October 2023

भीतर और बाहर

 भीतर और बाहर 

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सत्य जीवन के 

नहीं पाए जा सकते हैं बाहर 

तारों और ग्रहों के विस्तृत अध्ययन में 

वे तो समाये होते हैं 

हमारे ही भीतर की गहराइयों में 

हमारे हृदय की शोभा में  

मस्तिष्क की शान में 

और आत्मा की भव्यता में,

नहीं समझ पाते हैं हम जब तक 

क्या बसा है हमारे अंतर में 

नहीं जान पायेंगे हम 

विषय बाहर के...

कौन थी राधा : क्या थी राधा

 कौन थी राधा : क्या थी राधा 

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नहीं थी राधा कोई दैहिक स्त्री 

प्रतीक थी वह तो कृष्ण भाव की...


स्त्री अंग होता है प्रत्येक पुरुष में 

और पुरुष अंग प्रत्येक स्त्री में 

मनोभावों में भी होता प्राबल्य 

स्त्रेण और पुरुषैण भावों का 

तथ्य हैं ये जैविकी और मनोविज्ञान के...


कुछ ऐसा ही 

नैसर्गिक और आत्मिक संबंध था वह 

नैतिक अनैतिक  मानदंडों से हटकर 

ना हो सकता है यह घटित 

पति पत्नी के बीच 

ना ही बॉय फ़्रेंड और गर्ल फ़्रेंड के बीच 

यह ना तो शारीरिक है ना ही भावात्मक 

इसीलिए तो समा जाता है इसमें 

व्यक्तिव का हर तल...


यदि देखें दक्षिण से वाम को 

राधा पढ़ी जाएगी धारा, 

बहती है भाव धारा 

यदि उच्च से निम्न को 

मिले होते हैं विकार उस में 

और बहती है धारा जब निम्न से उच्च को 

हो जाती है विशुद्ध होकर राधा

समा गई थी 

ऐसी संपूर्ण राधा कृष्ण में...


माँगता है आज का पुरुष भी वही समर्पण 

क्या बन सकती है आज कोई राधा ?

किंतु पूछती हूँ मैं 

क्या कोई कृष्ण है कहीं ?

सहोदरी...


सहोदरी 

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सहोदरी !

मेरी प्यारी दीदी!

पहली बारिश की रिमझिम है 

मन भी हुआ मयूर सम है 

अन्दर बाहर झम झम है 

दिल चाहे नाचना छम छम है 

मेह नेह बन बात करे 

बिजली चमक झंकार करे 

बादल बजा रहे ढोल नगारे

पाँव थिरकते धुन पर सारे 

जल में कमल खिल खिल रहे हैं 

धरती आकाश मिल मिल रहे हैं 

प्रकृति ख़ुशी से बरस रही है 

देखो हरियाली सरस रही है 

चलो ना,

चलो ना

सहोदरी !

मेरी प्यारी दीदी !

मोर बनी थंगट करें

मोर बनी थंगट करें...


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नोट्स :


१-फ़्रेंच पेंटर William-Adolphe Bouguereau (1825-1905) की A Little Coaxing" title की डबल पोर्ट्रेट पेंटिंग है. इसमें दो बहने हैं. Coaxing का अर्थ है मीठी मीठी बातें करके मनाना.

कविता में छोटी बहन, बड़ी बहन को मना रही है, dance के लिए.  


२-थंगट  या थंगाट गुजराती नृत्य है जिसमें गरबा और डांडिया नृत्य होते हैं.  थंगट पहली बारिश में मोर सा नाचना है उल्लास और ऊर्जा के साथ.


माटी का पुत्र : विजया

 लाल बहादुर शास्त्री जी की जन्म जयंती पर 

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माटी का पुत्र 

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क्यों चल दिया अचानक 

धरा विदेशी पर 

आज ही रहस्य है,

जो भी किया वह है ज़ाहिर 

ठोस, अनुपम और दूरगामी 

आज भी अनुकरणीय है...


क़द काठी छोटी थी

तो क्या हुआ 

इरादे बुलंद थे 

हरा दिया था दुश्मन को 

सोच और निर्णय 

उनके स्वच्छंद थे...


भूख मिटाने का 

संकल्प भी कितना 

गहरा था 

"जय जवान जय किसान" का उद्घोष 

सुनहरा था...


हमारा यह द्वितीय प्रमुख 

जिसने पाया था अल्प कार्यकाल 

भारतीयता से ओतप्रोत था 

माटी का यह पुत्र 

प्रेरणा का अविरल स्त्रोत था...

Sunday, 10 September 2023

बोथ वे ट्रैफिक : विजया

 बोथ वे ट्रैफिक....

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खूब सुने हैं "सरमन"

पढ़ा, जाना और समझा भी है 

गूढ़ ज्ञान उस ऊँचे वाले प्रेम का 

जो हुआ करता है 

अप्रयास,अपेक्षा रहित सहज नैसर्गिक...


नहीं इनकार मुझे 

इस पावन भाव से 

जो अलौकिक है,दिव्य है, 

और है परम पवित्र,

होता है जो घटित 

पूर्णत: मुक्त हो जाने पर 

हमारे मोह माया लोभ अहंकार से 

किंतु लग जाती है उम्रें ऐसा हो जाने में 

तो क्या नहीं पियें हम यह अमृत 

क्या नहीं जियें हम इस दिव्यता को ?


हमारे आपसी रिश्तों में 

अपना सकें हम यदि निश्छल प्रेम 

बदल जाएगा अन्दाज़ रिश्तों को जीने का,

बेहद ज़रूरी है रिश्तों में होना 

प्यार के एहसास की नमी का 

रेत भी हो ग़र सूखी 

तो निकल जाती है वह मुट्ठी से...


मेरे दोस्त सुन !

रिश्तों में अकड़ नहीं,

चाहिए होती है पकड़

एहसासों में महसूस होती है जो अदृश्य सी 

जिसे कह सकते हैं थामना...

हाथों में हाथ देकर या लेकर आग़ोश में 

तकलीफ़ में साथ देकर 

लड़खड़ाने पर संभाल कर 

या दे कर  कंधा अपना 

ताकि कर सके कोई बौझ हल्का दिल का...


और "वन वे" नहीं,

यह होना चाहिए "बोथ वे"

ताकि ज़िंदगी का ट्रैफिक 

बिना किसी ब्लॉकेज के 

चल सके लगातार,

बात सिर्फ़ आपसी व्यवहार की है 

जो मानवीय है,ज़मीनी है, 

किताबी या अपवाद सा नहीं...

सपने और हक़ीक़त

 सपने और हक़ीक़त : एक और आयाम 

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सपने नहीं रहते फ़क़त सपने 

बन जाते हैं वे जब हक़ीक़त ज़िंदगी की 

ना बिखरते हैं ना टूटते हैं 

बस जिये जा रहे होते हैं 

ख़ुशगवारी के साथ पुरजोश पुरहोश 

छुपाने लुकाने को कुछ भी नहीं होता 

दिल में उमंग अधरों पर मुस्कान 

और फिर से कुछ और नये सपने 

बंद आँखों के भी, खुली आँखों के भी...


क्यों उलझें हम 

सपनों और हक़ीक़त के अंतर को खोजने में 

क्यों ना जियें हम हर पल 'यहीं और अभी'*

इसी सोच के साथ 

कि यही तो है पल आख़री...


टूट जाते हैं ज़िंदगी के आईने 

अक्सर हमारी ही गफ़लत से 

या कुछ ऐसी वजह से 

होता नहीं अख़्तियार जिस पर हमारा 

देख सकती है हमारी होशमंदी दोनों को ही 

और बिना ज़ाया किए समय और ऊर्जा 

चुन लेनी होती है हमें कोई राह 

जिसमें विगत से ना चिपक कर 

आगत की तरफ़ बढ़ जाने का जज़्बा हो ...


होते हैं हम अभिनेता ही 

निबाहते हैं बहुत सी भूमिकाएँ 

क्यों ना अभिनय करें हम इस तरह जैसे जी रहे हों जीवन 

क्यों ना जियें हम इस कदर जैसे कर रहे हों अभिनय 

आख़िर हो जाना है हम सब को ही तो रूखसत 

इस दुनिया के रंग मंच से...




Monday, 24 July 2023

उत्तर माँगती है हर स्त्री : विजया

 उत्तर माँगती है हर स्त्री 

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सीता तू संस्कारी ही रही 

और 

राम, ना जाने क्यों 

आप रहे मात्र पुरुष परम्परावादी ?


स्वीकारा था वनवास आपने 

पितृ आज्ञा की परंपरा निबाहने 

चल दी थी सीता 

छोड़ कर सब सुख वैभव 

साथ आपका देने...


आया था एक समय 

सुन कर किसी की अनर्गल बात 

भेज दिया था आपने 

हे "मर्यादा पुरुषोत्तम" !

सिय को अकेले अरण्यवास को 

क्यों नहीं गए गर्भवती निरीह स्त्री संग

छोड़ कर सिंहासन अयोध्या का ?


क्या नहीं थी सीता 

एक प्रेयसी 

एक सहधर्मिणी

एक संगिनी 

एक सहचरी,

अरे आप तो ठहरे 

राजधर्म के नशे में चूर एक पुरुष 

समूह के मनोविज्ञान के अन्तर्गत 

आदर्शों को जीने का उपक्रम करने वाले, 

दे देते न्याय जानकी को 

कम से कम प्रजा समझ कर ?


उत्तर माँगती है हर स्त्री आज 

अपने इन अबूझ प्रश्नों का...

Friday, 21 July 2023

आग सावन की : आकृति



आग सावन की 

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भीगे तन 

भीगे मन 

भीगे नयन,

होता है तरल ईंधन 

रंगहीन गंधहीन 

ठंडा ठंडा लगता 

कहलाता है जो पानी 

सावन रूत में बरसा 

किंतु लगा देता है अगन 

जल जल जाते 

तन, मन और नयन.

कृष्ण नीति : आकृति

 कृष्णनीति 

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नहीं समझते कोई दोष श्री कृष्ण 

अधर्मी को मारने में

छल हो तो छल से, 

कपट हो तो कपट से,

अनीति हो तो अनीति से,

अधर्मी को नष्ट करना ही 

होता है  "ध्येय" कर्म योगी का


इसीलिए दी थ्री शिक्षा 

केवल कर्म करने की 

कृष्ण ने अर्जुन को


धँस गया जब 

कर्ण के रथ का पहिया 

कीचड़ में 

देख कर संभावना और तत्परता 

प्राणहन्ता वार की अर्जुन द्वारा 

संकट में घिरे कर्ण ने 

कहा था अपनी ऊँची ध्वनि में 

"यह तो "अधर्म "है !

अधर्म है यह"


कहा था श्री कृष्ण ने,

अभिमन्यु को घेर कर मारने वाले,

और द्रौपदी  को भरे दरबार में 

वेश्या कहने वाले के मुख से 

नहीं देता शोभा 

आज धर्म की बातें करना


और कह दिया था श्री कृष्ण ने,

अर्जुन ! मत दो ध्यान 

कर्ण के विलापों पर 

आ गया है अब अवसर 

कर देने का अंत 

छद्म नैतिकता के भ्रम को

जीने वाले इस कौरव सेनापति का 


और 

नहीं चूका था 

अर्जुन महाभारत का

नज़रिया : विजया

 नज़रिया 

+++++

एक घड़ा 

जल से भरा 

एक कटोरी 

घड़े को ढके,

दोनों ही अर्थपूर्ण 

दोनों का ही काम 

महत्वपूर्ण...


घड़ा जानता था 

बहुत ही अहम है 

कटोरी का रोल 

वह ना हो तो 

जल में हो जाए 

रोलम पोल...


घड़ा भी जल संग्रह कर 

औरों की प्यास बुझाता था 

ख़ाना बनाने के लिए 

शुद्ध पानी मुहैया कराता था...


कोई किसी ने 

लगाया होगा पलीता 

कुछ रही होगी 

कटोरी की  स्वयं की 

श्रीमद्भ्रमगीता...


कटोरी को ना जाने क्यों 

आ गया था 

हीन भाव एक दिन 

मैं क्यों रहती हूँ हमेशा 

जल बिन...


बोली थी कटोरी उस दिन घड़े से 

आता है प्रत्येक बर्तन 

जो भी पास तुम्हारे 

भर देते हो उसे 

शीतल नीर से बिना कुछ बिचारे...


बोली : तुम्हारा रवैया है 

पक्षपात भरा 

याद है क्या, तुम ने कभी भी 

मुझे जल से भरा...


सुन कर बात कटोरी की 

घड़ा था मुस्कराया 

उसकी मंद मुस्कान देख 

कटोरी का पारा था चढ़ आया...


तुम ने ना देकर जवाब मेरे सवाल का 

हंसी मेरी है उड़ाई 

होकर आग बबूला 

कटोरी थी चिल्लायी...


मैने ना तो किया पक्षपात 

ना ही तुम्हारी हंसी उड़ायी 

ज़रा सोचो और देखो ध्यान से 

समझो बात की गहराई...


जो भी बर्तन आता है पास मेरे 

पाने को दान जल का 

झुकता है होकर विनीत 

नहीं करता है दंभ पल का...


तुम हो कि होकर चूर गर्व से 

मेरे सिर पर ही डटी रहती हो 

क्यों झुकूँ मैं नीचे 

बस इस ग़ुरूर में फटी रहती हो...


नीचे उतर देखो तनिक झुक कर 

भर जाओगी तुम भी शीतल जल से 

होकर परिपूर्ण एक दफ़ा 

शायद तुम्हें ना होगी शिकायत मुझ से...


अपने को भूल कर 

करना तुलना औरों से 

है निशानी हीन भावना की 

तू मेरी रक्षक मेरी सरताज 

संगिनी मेरी चाहना की...

Sunday, 9 July 2023

सुहानी हरियाली : विजया

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दोस्ती  उस से भी पहले की है और आज भी वही प्राथमिक है .हाँ आज से ५२ साल पहले हम दोनों के रिश्ते पर समाज और परिवार की मुहर लगी थी. ये पाँच दशक सब रंगों से भरे रहे और अब भी जारी है. कुछ लिखा उसे "साहेब" को डेडिकेट कर रही हूँ. आप सब का साथ बहुत मोटिवेटिंग है.

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सुहानी हरियाली 

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हरा है रंग कुदरत के जन्म का 

घूमता है जीवन इन्ही रंगतों के चहूँ ओर

प्रिय ! चले आओ 

और ले लो टुक महक 

इस कोमल शबनमी दूब की...


याद है ना तुम्हें 

गर्मियों के वो दिन

हम दोनों होते थे खुले आकाश तले 

और दिखते थे हमारे नाम लिखे हुए बादलों पर

अटूट और अनसुने, हम एक ही तो थे 

ढूँढ लिया था चैन और सुकून हमने अपने लिए 

इस खूबसूरत और अलग सी दुनिया में...


ख़ुद में एक जश्न थी 

कुदरत की दरियादिली

और चारों जानिब फैली हुई हरियाली 

कितना आनंद था 

खुली घाटियों और पहाड़ियों में दौड़ने में 

बढ़ जाता था जो और 

बारिश के बाद आकाश में उभरे  इंद्रधनुष से 

वो प्यार भरे आग़ोश और दर्द का काफ़ूर हो जाना 

बहुत से बूटे और अनगिनत ख़ुशबूएँ 

कर देती थी प्रफुल्लित मेरे संवेद और संवेगों को 

याद करो उन सुहाने  दिनों को 

कितना जवान मस्त और अल्हड़ था 

जीवन हमारा 

घूमा करता था जो इर्द गिर्द पेड़ों के...