Thursday, 19 March 2015

बुलबुल : विजया

बुलबुल
+ + + +
गुलशन में
खिज़ा आई,
बुलबुल
बेहोश हो गयी,
बहारां आई
गुल हुए गुंचे
महक फूटी,
मदहोश हो गयी,
चला आया
सैय्याद
लिये कफस
सोने का,
हुई असीर उसमें,
बेलोस हो गयी..
(असीर : कैदी, बेलोस : निष्कलंक, कफस : पिंजरा)

बेबसी

बेबसी 
# # #
आलम बेबसी का 
हुआ कुछ ऐसा
मंजिल सामने 
मगर पाँव हैं कि 
बढ़ते नहीं, 
जनाजा ख्वाहिशों का 
छूने को बेताब कंधे 
मर्सिया मौत का मगर 
शेखजी 
पढ़ते नहीं,
लड़खड़ायें हैं कदम 
बिन पिये यारों 
मैखाने के रिंद 
खुद ब खुद 
सँभलते नहीं,
जुलुम जी चाहा
किया करे कोई 
महल चाहतों के 
कभी 
ढहते नहीं, 
सींचे कोई 
कितना ही क्यों
खिज़ा के चमन में 
गुल ओ बुलबुल
कभी 
खिलते नहीं...

Sunday, 15 March 2015

कैसा यह द्वन्द है..

कैसा यह द्वन्द है..
# # # # # 
परवश या स्वछन्द है 
कैसा यह द्वन्द है 
१)
कैदी रहता अन्दर
जेलर रहता बाहर
दोनों सधे सधे से है
दोनों बंधे बंधे से है
दण्डित और दंडपाल का
विचित्र यह प्रबंध है
कैसा यह द्वन्द है...
२)
सी-बीच का नज़ारा
संग मालिक टॉमी प्यारा
हाथ साहेब के डोर है
जित भागे टॉमी
साहेब भी तित ओर है
मालिक घुमाए कुत्ता
कि कुत्ता टहलाये साहेब ?
सवाल यह चौबंद है
कैसा यह द्वन्द है..
३)
बाजार मिलल रहे कलुआ
पूछन लागै ठलुआ
कहाँ जावत हो बबुआ
आटा पिसावन भऊआ
आटा पीसै कि गेंहुआ ?
अकिल हमार तनि मंद है
कैसा यह द्वन्द है..
४)
अवलोकन करेंगे मित्र
देकर शब्दों को चित्र
कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा
कुनबा भानुमती ने जोड़ा
आशु कविता किन्ही
ज्यों की त्यों धर दीन्ही
नहीं मात्रा है ना छंद है
कैसा यह द्वन्द है..

चेतन

चेतन 
# # # #
समेट कर 

शब्दों 
विवरणों 
और 
भोंडे अभिनय में, 
छद्म प्रदर्शन 
'चेतन' होने का 
हो गया है फैशन 
आज का..

करते हुए 
नामोच्चारण 
'अवेयरनेस' 
'विटनेस' 
'मैडिटेशन' का, 
'तंत्रा' की आड़ में 
पहुँच जाते हैं 
ये तथाकथित 
ध्यानी और चेतन 
मात्र जीने
देह का 
संकीर्ण दर्शन 
जो छुपा होता है 
अवचेतन में...

समग्र सहजता 
मन और तन की 
होती है उदित 
जब फिर से, 
हो पाती है घटित 
'चेतना और स्वीकृति' :
एक मौलिक सत्व, 
ना कि कोई 
सस्ती अनुकृति..

Friday, 13 March 2015

न्यारी यारी : विजया

न्यारी यारी 
+ + + + +
मेंढक और चूहे की यारी 

हुई बहुत थी न्यारी 
बेमेल दोस्ती क्या कर देती 
सुनो कथा यह प्यारी. 

चंचल मेंढक जल में रहता 
थल में रहता चूहा, 
मेंढक उछलकूद था करता 
शांत जीव था चूहा.

मेंढक के कहने सुनने से 
चूहा भी भरमाया 
'फ़ास्ट फ्रेंड' बन कर चूहा भी 
अपने पर इतराया. 

कहा मेंढक ने मूषक राजा 
साथ हमारा गाढा
साथ जियेंगे साथ मरेंगे 
आये कुछ भी बाधा. 

बिन मेरे तू भी नहीं 
थी मेंढक की भाषा 
चूहा दब्बू समझ ना पाया 
इस यारी की परिभाषा.

मेंढक था चालक और जिद्दी 
चूहे से डोर मंगाई, 
पक्के एक गठजोड़ की भांति 
पाँव-पाँव बंधवाई. 

डोर बांध कर मेंढक बोला 
अब तो एश करेंगे
जुड़े रहेंगे एक दूजे से 
मिसाल पेश करेंगे.

अतिउत्साही दादुर राजा 
तैरे जल के भीतर 
खिंचता खिंचता चूहा बेचारा 
चला आया था अन्दर.

डूब गया तालाब में चूहा
मेंढक की नादानी से 
शव उसका ऊपरजो तैरे
खाये थपेड़े पानी से. 

उड़ रही थी चील एक भूखी 
नज़र उसे वह आया 
मार झपट्टा लपक लिया था 
'टू इन वन' था पाया .

प्राणों के भय से मेंढक भी 
जोर जोर टर्राया 
अब क्या हो बेमेल साथ का 
परिणाम सामने आया. 

यारी सफल होती है तब ही 
हो सामान स्तर जेहन का, 
चाहे फर्क हो धन दौलत का 
हो मेल चिंतन मनन का. 

इंद्रधनुष के रंग

इंद्रधनुष के रंग 
# # # # # # 
लिए हाथों में 

डलिया जीने की 
जीवन उद्यान में 
चुनने फूल 
इन्द्रधनुष के 
सभी रंगों के 
निकल गया था मैं,
हर रंग का 
अपना ही किस्सा था 
हर रंग का 
अपना हिस्सा था,
देखा तो 
जुदा था रंग प्रत्येक का 
चखा तो 
अलग था स्वाद हर एक का,
चलती रही थी 
जद्दोजेहद 
हर घड़ी हर पल
कभी पर्वत पर पांव थे 
सुनी थी कभी 
नदिया की कलकल, 
धरती की गोद में 
मैं खेला था 
समन्दर ने भी 
मुझ जैसे को 
शिद्दत से झेला था,
एक भोर 
जब चाँद घर जा चुका था 
हर दिन की तरह 
सूरज ने मुझ तक 
भेजी थी किरणे अपनी,
आज 
कुछ और ही होना था 
कुछ पाना था 
कुछ खोना था,
चुरा कर फूलों से 
हर रंग को मैंने 
अलग अलग पात्रों में भरा था 
महक फैली थी चहुँदिशि
पर राज कुछ गहरा था,
उठाया था एक रीता बर्तन 
उड़ेला था सब कुछ उसमें 
घुल गए थे रंग सारे 
हुआ था उदित एक रंग नयां उसमें,
खुश हुआ था सूरज 
हरियाली मुस्कुराई थी 
चाँद तारों ने भी 
उस शाम 
खबर मिलने कीपहुंचाई थी,
गूंजा था सुर आठवां 
वागेश्वरी की वीणा से
नाचा था आलम सारा 
फिजायें खिलखिलाई थी,
हुआ था कुछ ऐसा अप्रतिम 
कह पायेंगे उसको कैसे 
ये निर्बल पंगु शब्द 
घटित हुआ था आलिंगन 
स्वयं संग स्वयं हुआ आबद्ध..

Wednesday, 11 March 2015

निमंत्रित हुआ नियंत्रित..: विजया

निमंत्रित हुआ नियंत्रित..
+ + + + + +
(यह रचना मैंने अपने जीवन साथी के साथ मिलकर बुनी है..एक स्थिति जो अक्सर देखते हैं आसपास उसे शब्द देने का प्रयास है. smile emoticon )
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निमंत्रित हुआ नियंत्रित...
फूटी थी कोंपले कोमल
हरित हुए थे बूटे
गाते हम
उन्मुक्त क्षणों में
साथी साथ ना छूटे,
हुआ संग जब
पल प्रतिपल का
सब कुछ ज्यों अभियन्त्रित,
निमंत्रित हुआ नियंत्रित...
जब से लगा ठप्पा
रस्मों का
बदली है परिभाषा,
ऊर्जा उत्साह उद्दीप्ति को
लील रही हताशा
कल तक जो जागृत जीवंत था
हुआ आज प्रस्तरित
निमंत्रित हुआ नियंत्रित..
आस आस का
हुआ है लेखा
सांस सांस की गणना,
पहरे हैं पल पल
हरक़त पर
बात बात पर डरना
सब कुछ अब तेरी मर्ज़ी पर
नहीं कुछ भी है चित्रित,
निमंत्रित हुआ नियंत्रित...
द्वार सभी पर
पड़े हैं ताले
बंद हुए वातायन
निर्मल समीर की चाहना में
लगा है घुटने तनमन,
विकट पिपासा
आकुल ह्रदय है
सब कुछ तुम से मंत्रित,
निमंत्रित हुआ नियंत्रित...