Wednesday, 11 March 2015

आज की यारी

आज की यारी 
# # # # # 
आज की यारी 

शेर की सवारी 
उतरे तो मरे 
चढ़ा चढ़ा डरे...

आज की यारी 
स्वाइन फ्लू सी बीमारी 
जाँच ना होने तक साधारण 
बिना इलाज़ मरने का कारण.
आज की यारी 

कभी गौरी कभी कारी 
निभ जाए तो जयकारी 
बिगड़े तो महामारी..

आज की यारी 
होती न्यारी न्यारी 
कायदों में बंधी 
कानून सी सधी.

आज की यारी 
मतलब की पारी 
चिलमी यार किसका 
दम लगाया खिसका.

व्यर्थ : विजया

व्यर्थ 
+ + + 
क्यों करते हैं हम 

चर्चाएँ 
अर्थ और व्यर्थ की 
होकर आधीन 
अपने ही 
पूर्वाग्रहों से
या 
हेतु संकीर्ण हित साधन, 

परिवार 
समाज 
देश देशांतर 
राजनीति
धर्म 
शिक्षा
सम्बन्ध 
संघर्ष, 
बोलबाला है 
सब ओर 
अपने पक्ष में 
तर्कें घड देने का, 
घटनाओं को 
अपने ही सांचों में 
ढाल देने का,
दौड़े जा रहे हैं हम 
सिद्ध करने 
उन तथ्यों सत्यों 
परिभाषाओं 
मान्यताओं को
संशय है 
हम स्वयं को 
जिनकी सत्यता में, 
स्पष्ट अस्पष्टता की 
धुंध से घिरे हम 
मरे जा रहे है 
दुविधाओं 
और 
विरोधाभाषों में...

(आज चीन के कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा दलाई लामा की reincarnation पर की गयी अभूतपूर्व टिपण्णी के सन्दर्भ में प्रतिक्रिया पढ़ कर इसे लिखने का मानस बना : कितना विरोधाभास है कि नास्तिक और धर्म को अफीम मानने वाले कम्युनिस्ट कह रहे हैं कि reincarnation की थ्योरी सही है और दलाई लामा जो खुद इसके प्रतीक है कहते हैं कि अब 'No more reincarnation of Dalai Lama'.....कठपुतली दलाई लामा बनाकर तिब्बती लोगों को कब्ज़े में रखने की चाह रखने वाले चीनी हुकमरानो को दलाई लामा का यह कथन ईशनिंदा लग रहा है...और दलाई लामा के ह्रदय/मष्तिष्क परिवर्तन पर बस यही कहा जाय एक समसामयिक उदेश्य को पकाने परोसने के लिए शायद उन्होंने बुद्ध की हर बात को जांचने परखने के सिद्धांत को कार्यरूप दिया है....यह तो बस एक उदहारण है ऐसी मिसालें तो हर रोज सामने आती रहती है)

असीम

असीम 
# # # 
सीमित है 

जो हो चुका
और 
जो हो रहा है घटित,
असीमित तो है 
संभावनाएं
छोड़ देते हैं जिन्हें हम 
अनछुआ
अनन्वेषित 
लेकर आड़ 
भवितव्यता की,
खो जाते हैं हम 
तलाशते तलाशते 
विगत और वर्तमान की 
सीमाओं को 
करते हुए 
विश्लेषण और छिद्रान्वेषण
दौड़ाते हुए अश्व कल्पनाओं के
बद्ध कर स्वयं को 
पूर्वाग्रहों की मेख से, 
करते हुए परिक्रमा 
कोल्हू के बैल बन कर 
बंधी हो पट्टी 
जिसकी आँखों पर 
समूह की खोखली 
मान्यताओं 
रस्मों रिवाजों 
और 
विधियों की,
करते रहते हैं 
हम भूल निशि दिन
अथाह को असीम समझने की,
या मान लेते हैं 
संभावनाएं 
एक परिभाषित भविष्य को,
जलाते हुए एक दीया 
अपनी ही भित्ति के आले में
करके विस्मृत कि 
एक खुला घर भी है 
असीम संभावनाओं का 
परे इन चार दीवारों के...

Friday, 6 March 2015

द्रौपदी : विजया

द्रौपदी
+ + + +
अयोनिजा !
होकर यज्ञसेनी
हुई थी तू अवतरित
हवन की
पवित्र अग्नि से,
तुम्हारे जन्म से
मानो नकार दिया गया था
नारी का
मानव जीवन में
अनिवार्य होना..
तू थी
एक बेटी अवांछित
निमित था
जिसके अविर्भाव का
मात्र पिता की
प्रतिशोध प्रतिज्ञा,
ढोती रही
अपने नाम में
नाम उसका
कहला कर तू
द्रुपद पुत्री द्रौपदी....
योजनगंधा !
सुरभि तुम्हारे नीलपद्म की
दूर दूर तक
अनुभूत
की जाती रही
नहीं लिया गया
किन्तु संज्ञान
तुम्हारी सुगंध का
स्वयं तुम्हारे ही
परिजनों ने,
रह गयी थी तू
होकर
पांचाली पांचाल की ...
छीना गया था
तुम्हारा
पुत्रित्व
पत्नित्व
मातृत्व
स्त्रित्व
और
अस्तित्व
किन्तु बनी रही थी तू
सखी अपने सखा की,
जीते हुए मैत्री को
समाहित थी जिसमें
शक्ति
प्रेम से प्रार्थना तक की..
कृष्णा !
धारण किये
ताम्र वर्ण
आग्नेय चक्षु
मुक्त केशराशि,
किया था
सिद्ध तुम ने
रखती है एक नारी
चिंतन अपना
मस्तिष्क अपना
अस्मिता अपनी...
(अयोनिजा=जिसका जन्म नारी शरीर से नहीं हुआ हो)

तुलसी

तुलसी 
# # # #
तुम को भी
रोप दिया गया है 
तुलसी चौरे में,
एक आला भी तो है
जलाया जाता है
जहाँ दीया
प्रकाश जिसका
रखा जाता है
सीमित
मानो यूँ ही
बांध कर
स्वीकारना हो
सत्व तेरा..
लीपा पोता भी
जाता है
कुछ आँका भी
जाता है
लेकिन यह सौन्दर्यबोध भी
आधीन है
इस मान्यता के
बनी रहोगी तुम
तुलसी बस आँगन की,
इसी शर्त पर ही तो
तुम को
पूजा जाता है
सींचा जाता है
किया जाता है
महिमा मंडित...
जगते हैं
हर वर्ष जब देव
रचाया जाता है
'विवाह' तेरा
उसी सजायाफ्ता के साथ
किया था जिसने
खंडन
तुम्हारे सतीत्व का,
रखा जा सके ताकि
'ओफिसियली'
साथ उसके जो था
गुनाहगार तुम्हारा,
सच है
समरथ को नहीं दोष गुसाईं
दोष लगे तो समरथ नाहीं ..

Wednesday, 4 March 2015

मनड़ो (मन) (राजस्थानी) : विजया

मनड़ो (मन) (राजस्थानी) 
+ + + + 
मनड़ो म्हारो 
घुमक्कड़ घणों,
थिरचक ना रहवे 
अचपळ टाबर ज्यूँ,
कदै जमीन माथे
कदै पताळ में
ह'र कदै तो लाग ज्यावे
उडबा गिगनार में,
कदै अपणायत रा
सोता बहा दे
तो कदै पिछाण रा
टोटा जता दे,
राग- धेष मोह-माया
सगळा रा खेल
ओ बेरिड़ो खेल
राजी घणों हुवे
जे मिल ज्यावे
और बेराजी जद
छिन ज्यावे,
सुवार्थ री संकड़ी सोचां लेयने
देखतो औ चसमो चढ्यो
मनड़ो
स्यात ही देख भाळ सके
मुगत होय
आग्रहां स्यूं,
सुण सुण उपदेश देणिया री बात्यां
पढ़ पढ़ सासतरां रा ठाडा पोथा
इण बिगडयोड घोड़े री रास
जद जद खींचा
औ घणी दबड़क चाल चालण लागज्यावे
हाथां बाथां ना रहवे,
साखी बण जद जद देखां इण ने
औ देण लागज्या साथ
मानण लागज्या बात,
उडीक है बिं घड़ी की
जब म्हारो बायलाचारो
हु ज्यासी म्हारे मनड़े स्यूं
ह'र
म्हारी प्रज्ञा में
आ बस सी
थिरथा रो आणन्द.....

मन (विजया)

मन 
++++
मन मेरा 
बड़ा घुम्मकड़ 
नहीं रहता स्थिर 
नटखट बालक की तरह,
कभी धरती पर
कभी पाताल में
और कभी कभी तो
लगने लगता है
उड़ने यह
आकाश में..
बहा देता है कभी तो
स्त्रोत अपनत्व के
तो कभी जताता है
अभाव परिचय का भी
राग-द्वेष मोह-माया
सारे ही खेल खेलता है
यह निगौड़ा
मिल जाता है कुछ तो
हो जाता है खुश
और छिन जाने पर
निहायत ही नाखुश...
स्वार्थ के
संकीर्ण चिंतन का
चश्मा चढ़ा कर
देखता है यह मन,
शयद ही कभी
देख पाता है यह
होकर विमुक्त
समस्त आग्रहों से.....
सुन सुन कर बातें
धर्मोपदेशकों की
और पढ़ पढ़ कर
मोटे मोटे शास्त्र,
खींचते हैं
जब जब लगाम
इस बिगडेल घोड़े की
दौड़ने लगता है
तब तब यह
और भी तीव्र,
नहीं रहता है यह
नियंत्रण में...
हो कर साक्षी
जब जब देखते हैं
इसको
मानने लगता है
तब सुझाव और निर्देश,
प्रतीक्षा है
उस घडी की
हो जायेगा तब
दोस्ताना मुझ से
मेरे मन का,
और बस जाएगा तब
मेरी प्रज्ञा में आकर
स्थिरता का आनन्द...