Sunday, 31 May 2015

महारास (2) : विजया

महारास (2) 
+ + + +

महारास,
श्रृष्टि के कण कण में 
महामिलन
पुरुष और प्रकृति का
मेघ 
तड़ित
और 
पवन बावरी 
हो कर एकजुट 
कर देते हैं 
विचलित 
धरा को,
पिघलाकर
भू-स्तर को 
घोल देते हैं 
संग स्खलन के
और 
पहुँचा देते हैं 
सागर में,
होता है घटित 
विसर्जन 
व्यक्तित्व का 
बोध 
अस्तित्व का,
जाग्रति 
चेतन की
स्वीकृति 
समग्र की,
पुनर्स्थापना 
वर्णनातीत सत्य की 
परिणति 
प्रत्यय की..

महारास- (1) : विजया

महारास- (1) 
++++++
होना होता घटित 
यदि मौन महारास 
केवल मात्र 
राधा-कृष्ण युगल में 
तो 
क्यों कर करते 
चीर हरण कन्हैय्या
समस्त गोपियों के,
क्यों कर हटता पर्दा 
मध्य आत्मा और परमात्मा के,
क्यों कर होती दृष्टव्य 
छवि राधिका की 
सोलह सहस्र गोपिकाओं में,
क्यों कर दीखते कान्हा 
बनके जोड़ीदार 
हर एक गोपिका के...

यदि सोचा जाय
परे सभी कथाओं के
महारास कुछ नहीं 
बस स्थिति है 
प्रेम के घटित होने की 
मिट जाते हैं जहाँ 
सब अंतर 
और 
होता है दृष्टव्य चहुँ ओर 
प्रेम मात्र प्रेम..

रूपकों की यह 
रोलम झोल 
ना जाने क्योंकर 
दिखा देती है 
किस को क्या ? 
बना दिया गया है 
आज किन्तु 
पर्याय महारास को 
अतृप्त वासना का 
जिसमें देह-क्रीडा को 
औढा दिया जाता है 
लबादा आध्यात्म का 
और 
समझने लगते हैं 
क्रीड़क़ स्वयं को 
राधा और कृष्ण...

अंगीकार......: विजया

अंगीकार......
+ + +
स्वीकारा होगा
तुम को
किसी ने 
तथाकथित यथावत
मैं ने तो किया है
अंगीकार तुम को,
पृथक रख कर
देखते रहते हैं वो
तुझ को
करते हुए
महिमामंडित
स्वयं को
कहते हुए बारम्बार
"देखो, हम ने
इसके ऋण और धन को
जानते हुए भी
अपना लिया है इसको,"
तुम्हारे ऋण (Minus)
तुम्हारे धन (Plus)
हैं महत्वपूर्ण
तुम से अधिक इनको,
होते हैं
मानवीय सम्बन्ध
बुद्धि विलास के
साधन इनको
विश्लेषण
संश्लेषण में
हो जाता है जीवन व्यतीत
और लिखे जाते हैं
असंख्य पृष्ठ
अपने ही आग्रहों को
सिद्ध करने
गद्य में
पद्य में....
बन गए हो तुम
अभिन्न अंग मेरे
और
हो गया है विलय
मेरा तुझ में
तुम्हारा मुझ में
बिना किसी खंडन मंडन के
बिना किसी भाषा परिभाषा के
बिना किसी माप परिमाण के
विज्ञानं की भाषा में
हम हैं एक मिश्रण
यौगिक नहीं,
तेरा तत्व है तू
और मेरा मैं
सहज है
मेरा "मैं' होना
और तुम्हारा 'तुम' होना
सहअस्तित्व के शील में
मिटजाना तो नहीं होता
आवश्यक,
प्रकृति में भी
जीते हैं सब सत्व एक साथ
संग अपने अपने गुणधर्मों के
जुड़ कर श्वास-निश्वास की प्रक्रिया से
नहीं है बाधक पृथकत्व
एकत्व घटित होने में
सनिकेत और अनिकेत
अवस्थाएं हैं मन की
अधीन सापेक्ष व्यवस्थाओं के,
समाहित प्रेम में
एक वास्तविकता है
यौन की
शब्दों के परे
एक भाषा है
मौन की
व्यर्थ है मीमांसा और समीक्षा
कब कहाँ और कौन की,
आओ सुन तो लें
वह शांत ध्वनि
जो गूंज सकती है
मन के सन्नाटों में भी.. smile emoticon

Friday, 3 April 2015

वशीकरण

वशीकरण 
****************

('पजेसिवनेस' को, खासकर, चाहत और प्यार का एक अभिन्न अंग माना जाता है..कितने ही 'बुध्दिजीवीय' विमर्श हो जाए इस पर, क्लेरिटी से सोचने समझने एवम निरंतर अभ्यास और अनुभवों के बिना इस से निजात पाना मुश्किल ही होता है..हमारी कल्चर में पजेसिवनेस' के इस ज़ायकेदार भाव को लेकर बहुत कुछ लिखा और गाया गया है..हमारी फिल्में भी इसे खूब डेपिक्ट करती है. मेरा चिंतन जो भी हो इस पर, मैंने इस मुक्त कविता 
में कोशिश की है एक शिद्दत से प्यार करने वाली संगिनी के मनोभावों/designs को शब्द देने की. इस रचना में एक folk वाला आयाम है.(ठेठ राजस्थानी में एक बंध इसीलिए लिखा है.) फिर कभी intellectual आयाम के expressions को भी शब्द देने की कोशिश करूँगा.)
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वशीकरण 
# # # 
मत जाना 
करीब उसके 
पिला देगी 
घोल कर कुछ भी 
शरबत में,
बांध रखा है उसने 
एक मंत्राया पुतला 
अपने सहन में 
खड़े पीपल की शाख पर 
सुना है जो भी गुज़रता है 
उसके साये से होकर 
रह जाता है वह 
उसीका होकर, 
आँखों में लगाती है 
जो काजल वो 
दरिया किनारे के 
दरवेश-बाबा से लायी है 
जिसको भी देख ले
उसकी तो बस 
राम दुहाई है, 
ना रख देना पाँव 
उसकी बनायी अल्पना में 
कितनी रातें 
बिता कर मसान में
साधा है उसने 
मारण और वशीकरण 
जो घेरे, त्रिभुज, चतुर्भुज 
बने हैं उसमें 
ना जाने किसमें मांडी हो 
तुम्हारे खातिर 
कोई संगीन सी जकड़न...

सुणज्यो जी 
अरज आ म्हारी 
औ म्हारा ढोला लशकरिया !
औ म्हारा जोड़ी रा भरतार !
औ म्हारा काळजिये रा हार !
म्हें करूँ सा थान्स्यु मनुहार !
मत जाज्योसा पोळयां बिण री
हाट हठीली है वो 
मन री काळी है वो 
जाण जुगारी है वो 
कामणगारी है वो....

(ढोला लशकरिया= ढोला मारू की प्रेम कहानी बहुत नामी है राजस्थान में . मेल पार्टनर को ढोला कहा जाता है....लश्करिया शब्द झुण्ड/जाते को denote करता है. राजस्थान से सैन्य दल या बिणजारे सौदागर इत्यादि जत्थों में सुदूर की यात्राएं करते थे.
भरतार= पति,पोळयां=दरवाज़ा, बिण री=उसकी, जाण जुगारी=बहुत बड़ी ज्ञाता, कामणगारी=जादू टोना करने वाली.)

अनुकूल-प्रतिकूल : विजया

अनुकूल-प्रतिकूल 
+ + + + + 
मुक्त पंछी 

भावों से अनुकूल 
बंदी पंछी 
भावों से प्रतिकूल....

गाये जा रहा है 
मुक्त पंछी 
आज़ाद तराने 
होकर सवार 
पवन के उड़न खटोले पर 
नहाता हुआ 
सूरज की किरणों में
चहकता हुआ 
सारा आकाश है मेरा.....

बंदी पक्षी 
पिंजरे की सलाखों के पीछे 
कटी पंखों के साथ 
दुस्वप्नों से ग्रसित
गाता है किन्तु 
रुंधे गले से 
गीत आज़ादी के
बिलखता हुआ 
काश ! होता 
सारा आकाश मेरा....

मुक्त पंछी 
भावों सेअनुकूल 
बंदी पंछी 
भावों से प्रतिकूल...

राजस्थानी कुण्डलियाँ : विजया

राजस्थानी कुण्डलियाँ

+ + + + + +
(1)
कामणगारी कामणी तिरछा बिण रा नैण
बोल कोल री बात के, समझे सगली सैण,
समझे सगली सैण, होळ स्यूं आडो खोले,
छेलो घणों चलाक, आहिस्ता भीतर हो ले.
(कामणगारी कामणी=टोनेबाज कामिनी, बिण रा=उसके, सैण=इशारा
आडो=दरवाज़ा)
(2)
सौ हुवे सुनार री, एक लुहारी चोट
हिये च्यानणों चिळकज्या,पड़यां धमाधम सोट
पड़यां धमाधम सोट, अकल आडू ने आवे
भागे तेतिसा देय, फेर ना पाछो आवे.
(च्यानणों=प्रकाश, चिळकज्या=चमक जाता है,
सोट=लठ्ठ, आड़ू=बददिमाग, तेतिसा=तेज़ दौड़-मुहावरेदार)
(3)
ज्ञान भरम रो गुमड़ो, मांय तरक री राध
बात बात रगड़ो रचे, बात बात जिद बाद
बात बात जिद् बाद, अरथ न अनरथ कर दे
जिण हांडी ना पाव समाय, उठे पंसेरी भर दे.
(गुमड़ो=फोड़ा, राध=मवाद, रगड़ो=झंझट/विवाद, जिद-बाद=जिद्द/rigidity,पाव=1/4 सेर)
(4)
अकल हिये री फूटरी मिनख जमारे सोय*
पोथी भण घणा मरया, पंडत भया ना कोय,
पंडत भया ना कोय, थोथ में जोत जगावे
चेला चेली रो टोळ, एवड़ ज्यूँ हांक्या जावे.
(फूटरी=सुन्दर, मिनख=मनुष्य, जमारो=जन्म,सोया=सोहता है/ अच्छा लगता है भण=पढ़ कर, थोथ=थोथी जगह, टोळ=झुण्ड, एवड=भेड-बकरी का झुण्ड, हांक्या=हांके:हांकना क्रिया)
*जेहन/दिल की अक्ल (विवेक) ही सटीक/सुन्दर होती है और वही मनुष्य योनि पर शोभित होती है.

वो मर गया है

वो मर गया है
# # # # #
वो मर गया है 
मगर
हिलडुल तो रहा है
साँसे भी ले रहा है
चल भी रहा है
फिर भी रहा है
बोल भी तो रहा है..
देखो,
यह सब तो बातें हैं
इस सराय की
जिसमें रहता था वह
कब से टिके हुए
मुसाफिरों की
एक भीड़ के साथ
जिसमें से एक
हुआ करता था
वो खुद भी,
जो दिख रहा है
वह 'वो' नहीं
वही सराय तो है
जिसे तुम कह देते हो
उसका जिस्म
उसकी शख्सियत
उसका वुजूद..
कहाँ है वो होशमंद ?
जो सब कुछ देख लेता था
एक लम्हे में,
समझ भी लेता था
अनकही बातें मन की,
कहाँ वह जिंदादिल शख्स
जिसके ठहाके
कोसों भगा देते थे
उदासियों को,
कहाँ है उसकी वो बातें
जो बरपा कर देती थी
ज़ज्बा जीने का,
कहाँ गया वो नूर
उसकी आँखों का
महज़ एक नज़र ही उसकी
हुआ करती थी मौजूँ
जां फूंकने
मुर्दा दिलों में....
खून किया है
किसी ने
के कर ली है
उसने ख़ुदकुशी
या हो गया है बेहोश
मगर क्यूँ लगता है ऐसा :
वो मर गया है...
(अगला शब्द : मुसाफिर)