vinod's feels and words

Tuesday, 30 June 2015

छोह और बिछोह : विजया

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छोह और बिछोह + + + + + शब्दों और इंसानों में  कभी कभी महसूस होता है समानता असमानता निर्भरता और पूरकता का रिश्ता प्रथम दृष्टि में, किन्तु ह...

खुदा भी खुदगर्ज़ है... विजया

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खुदा भी खुदगर्ज़ है... + + + + चारागर रुक जा ये एक लाइलाज मर्ज़ है इंसां की क्या कहें खुदा भी खुदगर्ज़ है, रवायतों को निबाहते रहो उसूलों क...

आज के बुद्ध..

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आज के बुद्ध.. # # # जटिलताएं जीवन की  कुछ घटी कुछ अनघटी  घेर लेती है जब ज़ेहन को  या आता है दिल में  करें कुछ ऐसा  जो हो  बिलकुल ही 'एक्...
Friday, 26 June 2015

शब्द्नामा

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शब्द्नामा ######## (हमारे आशु कविता ग्रुप में मुझे "यौन" शब्द पर लिखना था और इस कविता के सृजन के प्रोसेस में मुझे अपने द्वारा ...
Wednesday, 24 June 2015

ऐ संगतराश ! : विजया

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ऐ संगतराश !  + + + +  चंद लम्हों को पा जाते हैं  तालियाँ  तमाशे बाजीगरी के  किस्से और भी है यहाँ  अक्कासी और तामीरी के  कौन पूछता है तुम्हे...

भंगित वीणा के तारों से..... : विजया

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भंगित वीणा के तारों से..... + + + +  तारों से भंगित वीणा के  संगीत कहाँ से आयेगा ? अंधे दर्पण में  मीत मेरे  प्रतिबिम्ब कहाँ से  आयेगा ? तु...
Monday, 1 June 2015

सरल : विजया

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सरल +++++++ सरल और जटिल  कितने सापेक्ष होते हैं जो सरल है  तुम्हारे लिए  वही तो जटिल है  मेरे लिए, भावनाएं असुरक्षाएं  मान्यताएं चिंतन  स्प...
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Vinod Singhi
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