Friday, 12 February 2021

मैं बेपरवाह....


मैं बेपरवाह...

######


अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू

अल्लाह हूँ  अल्लाह हूँ अल्लाह हू...


कश्मकश उलझने, उलझने कश्मकश 

उम्मीद का दीया ही ,देता  उजाला बस 

किस किस की करूँ परवाह मैं बेपरवाह

लुत्फ़ रक़्स का मिला तो हुआ हूँ मैकश..


अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू

अल्लाह हूँ अल्लाह हूँ अल्लाह हू...


तू ना सही....तेरा होना तो यहाँ है 

सितारों से ज़रा आगे तेरा मेरा जहाँ है 

चल रहा है मेरे साथ हर पल वो तू है 

तू यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ  जाने कहाँ कहाँ है..


अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू

अल्लाह हूँ अल्लाह हूँ अल्लाह हू...


ना एक हो सकती है दो शम्माएँ,सुन

रोशनी दोनों की हो जाती है एक,सुन 

दुई की बातें कर कर ना थका है रे तू

पुतला हूँ मैं तो क्या,मेरा खुदा मैं, सुन..


अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू

अल्लाह हूँ  अल्लाह हूँ अल्लाह हू...

पात्र...

 पात्र...

####

फूलों का नही

शूलों का ही था 

पात्र मैं,

स्वीकार हुए 

मुझे तभी सहर्ष 

उपहार नुकीले 

काँटों के,


रखी नहीं थी मैं ने 

अपेक्षा कभी,

कि कोई मुझे 

गुलाब दे,

नयनों का 

खारा पानी 

हुआ था मंज़ूर मुझ को 

ना थी तलब 

कोई मुझे 

अपने दिल की 

शराब दे...

कहे बिन....: विजया

 

कहे बिन...

+++++

बहुत सहा 

अब सहा न जाता

कहे बिन 

अब रहा न जाता...


पौर पौर में 

दर्द समाया 

मन पर भी 

पीड़ा का साया 

नदिया मैली 

अब बहा न जाता

कहे बिन 

अब रहा न जाता...


जोड़े शाश्वत 

दिलासा झूठी 

वादे सारे 

सब क़समें झूठी 

जर्जर चादर 

अब तहा न जाता

कहे बिन 

अब रहा न जाता...


आँसूँ कब के 

शुष्क हुए हैं 

लब मेरे भी 

खुश्क हुए हैं 

राख हुई 

अब दहा न जाता 

कहे बिन 

अब रहा न जाता...


देह आत्मा 

सब टूट गए हैं 

वेदन सोते 

फूट गए है 

कच्चा धागा 

अब गहा न जाता 

कहे बिन 

अब रहा न जाता...


---विजया-2021


(साहेब का शुक्रिया...मेरी हर ख़ुशी पर नाम है जिसका😊

किसी और के मनोभाव जी लेने और लिखने में साहेब की महारत का लाभ मिला है मुझे इस रचना के लिए गाइडेन्स के रूप में)

Tuesday, 19 January 2021

हाइकु नैसाखिए के...


हाइकु नौसखिये के,,,,

###########


१)

कैसा घमंड 

एकाकी है पतंग 

कटती रही...


२)

हारा संसार 

अपना ही प्रचार 

झूठे बहाने...


३)

जीवन भर 

संबध का बंधन 

यही बर्बादी...


४)

गुड ओ तिल 

चिपचिपाहट ही 

मिठास कहाँ...


५)

कटी पतंग 

घर है ना ठिकाना 

मैं अनजाना...


चलते चलते 😀


बताएँ त्रुटि 

हौसला आफजाई 

यही कमाई...

😊😊😊

संगीता दीदी 

किया है संशोधन 

हो अनुमोदन 😊

धन्यवाद : Sangeetadi और Pushpaji.....ध्यानार्थ : Kanakji)

कहाँ खड़े हैं हम...,: विजया


कहाँ खड़े हैं हम आज ?

+++++++++++++


देखा करते थे 

हम भी सपने सुहाने,

होकर लहरे 

तलाशते अपनाते 

हर मौक़े को 

पहुँचने किनारों के पास,

पहुँच कर लौटना..

फिर पहुँचना...

बार बार लगातार,

लगता था नाकाफ़ी मगर 

इतना सब पा जाना  भी...


देखा करते थे 

हम भी सपने सुहाने,

आकाश को लाल रंगने के 

अपने जलते हुए जुनून से,

ताप था जिसका 

सूरज से भी ज़्यादा,

बुझ जाते थे 

ये शोले भी भड़क कर,

मगर आह !

वो लुत्फ़ और वो सुकून !!


देखा करते थे 

हम भी सपने सुहाने,

आंक सके आग से 

गा सकें संग हवा के 

बेफ़िक़्र दीवाने हो कर,

और कर रही हो आवा जावी 

आवारा रूहें 

गुजरते हुए क़रीब से हमारे...


देखा करते थे 

हम भी सपने सुहाने,

कैसे पीछा किया करता था चाँद 

ताकतवर सूरज का,

क्या मिला था मगर उसको  

बड़ी मशक़्क़त के बाद ?

बस टिमटिमाहट 

नन्हें कमजोर सितारों की...


हम ही तो थे ना 

जो देखा करते थे तारे

एक दूजे की आँखों में,

सोचते हुए 

कोई नहीं है बढ़ कर हम से,

मगर कौन हैं हम आज ?

कहाँ खड़े हैं हम आज ?


~~~~:~~~~

(Thanks to Saheb yane Vinod Singhi ko 

हर सपने और हक़ीक़त में साथ रहने के लिए 

आज तो इस नज़्म से सीमित छेड़ छाड़ करने के लिए.)

प्रेम कर पतंग बस चाहती है प्रेम...

 


प्रेम की पतंग बस चाहती है प्रेम...

########

प्रेम की पतंग का 

कौन हिस्सा तेरा 

कौन सा मेरा 

मालूम नहीं....


डोर कौन है 

हाथ किसके है

मालूम नहीं....


किसका आकाश है 

किसकी मुँडेर हैं 

मालूम नहीं...


मालूम है तो 

बस इतना 

साथ हैं 

उड़ने में भी 

मचलने डोलने में भी 

स्थिर चाल में भी 

कटने में भी 

गिरने में भी 

लुट जाने में भी...


हर हालात ओ वक़्त का 

साथ है ना 

प्रेम

प्रेम की पतंग 

चाहती है बस 

प्रेम...

मालूम है ?😊



Monday, 21 December 2020

सहस्रार...

 

सहस्रार,,,

#####

पाने को 

कहते हैं संसार 

खो देना सब कुछ 

कहलाता 

सहस्रार,

है उन्मत्तता 

परमानंद 

नहीं होता जिसका 

कोई आकार,,,

ना चाहूँ मैं 

ऐसा सहस्रार 

मुझे तो प्रिय 

समग्र संसार,

अपना लूँ स्वत: 

सहस्र कमल दल 

जब जब जाना हो 

उस पार,,,

जी लूँ 

निज जीवन का सार 

अपना कर 

जगती का व्यवहार,

स्वीकारूँ 

दुःख सुख को समरूप 

करूँ ना 

कोई मैं प्रतिकार,,,

हो चाहे 

अपना मार्ग दुश्वार

गंतव्य का हो ना कोई

प्रकार,

क्या सम्भव है विराग 

जीये बिना 

अभिसार

हो यह अंतर शोध 

लगातार,,,


(कविता के पृष्ठभूमि में कुछ तंत्र और ध्यान....या यूँ कहें परमनोविज्ञान की बातें हैं जो नोट्स के रूप में कमेंट्स सेक्शन में दी गयी है...उनके अवलोकन की सादर अनुशंसा.)

Notes :


सात चक्रों की बात आती है : मूलाधार,स्वाधिस्थान, मणिपुर,अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार. सहस्रार एक भिन्न विषय हो जाता है यहाँ तक कि कुछ विद्वान इसे चक्र तक नहीं मानते क्योंकि इड़ा और पिंगला का प्रभाव नहीं होता इसमें. 

कुछ इसे सर्वोपरि और तुरीय अवस्था का प्रतीक मानते हैं.


१. सहस्रार परम तत्व का स्थान है. इसी स्थान से मनुष्य स्व भाव की वासना से मुक्त हो कर ब्रह्म भाव के सत्य की और बढ़ता है तथा समाधि अवस्था को प्राप्त करता है. अगर शरीर का पूर्ण प्राण एक हो कर सहस्त्रार चक्र में केंद्रित हो जाता है तो व्यक्ति निश्चय ही समाधी अवस्था को प्राप्त कर लेता है, जहां पर उसका अस्तित्व ब्रह्म में विलीन हो जाता है.आध्यात्मिक द्रष्टि से यह एक अत्यंत ही उच्चतम अवस्था कही जा सकती है जहां से व्यक्ति विविध ब्रह्मांडीय रहस्यों तथा सत्यों से परिचित होने लगता है. 


२.सहस्रार कोई मार्ग नहीं है। जब हम मार्ग शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उसका मतलब होता है - एक सीमाओँ में बँधा, स्थापित रास्ता। सीमा में बाँधने के लिए आपको एक भौतिक स्थान की जरूरत होती है। सहस्रार कोई भौतिक स्थान नहीं है। शरीर के भूगोल में उसकी मौजूदगी है, मगर वह किसी भौतिक स्थान का प्रतीक नहीं है। इसलिए, उससे जुड़ा कोई मार्ग नहीं है।

सभी देवताओं में शिव सबसे बलवान और ऊर्जावान हैं। इसका मतलब है कि वह सक्रीयता(एक्शन) के प्रतीक हैं, मगर वह भी कई बार सहस्रार में होने के कारण उन्मत्त(नशे से भरे) रहते हैं।


३.रामकृष्ण परमहंस काफी समय सहस्रार अवस्था में थे

इसे लेकर कई कहानियां हैं मगर एक प्रभावशाली उदाहरण होगा, तोतापुरी और रामकृष्ण परमहंस का। रामकृष्ण सहस्रार में बहुत अधिक रमे हुए थे इसलिए उनका लंबे समय तक जीवित रहना मुश्किल था। क्योंकि यह ऐसा स्थान नहीं है, जहां आप भौतिक शरीर में बने रह कर धरती पर मौजूद रह सकते हैं। वह आनंदपूर्ण और शानदार अवस्था है, मगर वह शरीर में बने रहने लायक स्थान नहीं है, वह ‘जाने वाला’ स्थान है। आप बीच-बीच में उसे छूकर वापस आ सकते हैं। जब कोई व्यक्ति वहां लंबे समय तक रहता है, तो उसका शरीर साथ छोड़ देता है।


४.आपने सुना होगा कि तोतापुरी ने शीशे का एक टुकड़ा लेकर रामकृष्ण के आज्ञा चक्र पर वार कर दिया ताकि सिर्फ परमानंद में तैरते रामकृष्ण को स्पष्टता और बोध तक नीचे लाया जाए। क्या परमानंद में तैरना अच्छी बात नहीं है? यह बहुत बढ़िया है मगर उस स्थिति में आप न तो काम कर सकते हैं और न ही कुछ प्रकट कर सकते है। यह स्थिति नशे जैसी होती है। यह अवस्था बहुत बढ़िया और अस्तित्व संबंधी रूप में शानदार होती है, मगर आप उन अवस्थाओं में काम नहीं कर सकते। चाहे आप काम कर भी लें, तो आप बहुत प्रभावशाली नहीं होंगे। यह भौतिक और अभौतिक के बीच एक धुंधली दुनिया है।