Sunday, 30 September 2018

बादलों की ओट में.....



बादलों की ओट में
खो जाना फिर से
चाँद का
प्यासी नज़रों का ढूँढते रहना
चंद अल्फ़ाज़
बात अपनी कहने को,
वो ही जगहें
वो ही राहें
वो ही फ़िज़ाएँ
नहीं दिख रहा था
तो बस चाँद का अक्स
गहरी झील के
हरे हरे पानी में,,,,,

अनगिनत अक्स....



बिखरा था खुल कर
आइना
कुछ इस क़दर
अक्स मेरे
एक से
अनगिनत हो गए,,,,

स्पंदन.....,


शांत हो जाते हैं शब्द
नहीं होता है
मौन भी मुखर
स्पंदन कहते हैं
सुनते भी हैं स्पंदन
और हो जाती है तैय्यार
एक उजली सी राह
नए सृजन की...


वैसी ही बाज़ी.....



वैसी ही बाजी,,,,,
#######
सुनो !
पूरब पश्चिम
उत्तर दक्षिण
कहीं भी खेल लो
एक से हैं करीब करीब
कायदे इस शतरंज के,
वो ही नीयत जगहें है
वो ही नीयत चालें
वजीर बादशाह के पास या
कोई कहे
रानी राजा के पास,
घोड़े की चाल
अढाई घर की,
हाथी सीधा
ऊंट तिरछा
और
प्यादा एक चाल सीधी
मगर
मारे तो टेढ़ी
और उसकी तरक्की के
कायदे भी तो वही
चलते चलते
जहाँ पहुंचेगा
बन जाएगा
वही तो,
शह भी वही
वो ही मात,
सच्च मानो
शुरू में बहुत कुछ
अलग सा लगता है
मगर
कुछ देर में हो जाता है
महसूस
अरे यह तो है
वैसी ही बाजी
जो खेली थी
हम ने
कभी किसी के संग भी,
कभी जीते थे
कभी हारे थे जिसमे,,,,

कुछ अनकही बातें : विजया



कुछ अनकही बातें.....
+ + + + + + + +
जिस धज से जीयी हूं उस धज से ही मैं जाऊं
सज धज के ही रही हूं सजघज के चली जाऊं...

करे याद मुझ को वो ही जिस ने है दिल लगाया
मरहम बनी मैं उसकी जिसने था दिल दुखाया...

नेकी और बदी की वो बड़ी बड़ी सी बातें
अपने समझ ना आई वो सब किताबी बातें...

तुम को देखा जाना और तुझ में ही सब पाया
काम से राम तक का हर सबक तुम ने सिखाया...

वो नन्हे हाथों की छुअन वो जवानी में थाम लेना
ढलती उम्र में भी सजना बस तेरा ही पयाम लेना...

उठा के सर जीयी हूं झुकवा यह सर ना देना
आखरी सांस आये, तेरी बाहों का सुकून देना...

कुछ भी हुआ हो बेजा बिसरा तुम उसको देना
हर हसीं लम्हे को दिल में गहरा बसाये रखना...

जब याद मेरी आये तो चुपके से रो तू लेना
जग को सुना कर दुखड़ा अहसान तुम न लेना...

खुशियों के तुम सौदागर खुशियां लुटाते रहना
सुबहो शाम तितलियों को बागों की बहार देना...

जानती हूं मैं कबसे तुम खुद इश्क़ हो गए हो
सच इसी वजह से तुम मेरे वुजूद हो गए हो...

फिर भी हूँ मैं इंसां, देवता ना  बन सकी जो
तुम को जुदा में खुद से कभी ना सह सकी मैं...

यह जन्म मेरे जाना कुछ वैसा ही निबाह देना
अगली ज़िन्दगी में तुम मुझे अपना इल्म देना...

तेरी सलामती ही है मकसद मेरी ज़िंदगी का
खुश रहे तू हरदम यह मौज़ू मेरी बंदगी का...

इबारतें..,,


लिखा जाती है
ख़ुद ब ख़ुद
इबारतें
इन झुर्रियों के बीच,
देखा किया आइना
और पढ़ ली,,,

जुबाँ मोहब्बत की : विजया



पढ़ लेते हैं जो
जुबां आंखों की
फ़क़त कहने को,
अनजान है उल्फ़त से
कहते हैं प्यार
महज़ बहने को,
गुज़रने को
हर शब ओ दिन
गुज़र जायेंगे,
सितम बाकी है
मुहब्बत में
अभी सहने को...