Wednesday, 3 January 2018

रिश्ता शौहर और बीवी का : विजया


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Dedicated to my Loving Companion, friend, philosopher and guide who introduced me to many an unknown aspects of human life)
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होते हैं ये समाजी रिश्ते
स्पाउसेज के भी
माटी के सूखे दीये की मानिंद
होता नहीं जो रोशन 
पड़े ना जब तक तेल
मुहब्बत,समझ 
और एहतिराम का...

बाज़ वक़्त ये रिश्ते
होते हैं खड़े
सहारे बैसाखियों के
जिन्हें कह देते हैं
मज़हब, दौलत, कतरे ब्योंते कानून
दे सकते हैं
जो सुख गुलामी का,
नहीं मिल पाता है मगर
वरदान मन की पीड़ा का
एहसास आज़ादी का...

अगन हवन की
थमा देती है हाथों में
एक अदद रिश्ता,
नहीं पहुँच पाती मगर
कभी भी लौ उसकी
मन के अँधेरे कोनों तक,
और इस तरहा
रिश्तों की किसी भी हद से
बाहर हो जाता है
हर यक कोना
वुज़ूद का.....

रस्मे कसमे और कायदे
बाँध सकते है
दो जिस्मो को,
रख सकते हैं वे किरदारों को
चार दीवारों से घेर कर
नीचे एक छत के
मगर
खातिर रूहों के जुड़ाव के
ज़रूरी है मिलना
दिल ओ जेहन का....

कितना अजीब है
यह रोज़गार शादी का
शौहर और बीवी
लग जाते हैं
अपने अपने ओहदों पर
और
बिना किसी तरक्की के
बने रहते हैं ताजिंदगी
बीवी और शौहर
मानो बस यही है
आगाज़ ओ आखिर
इस ज़िन्दगी का...

काश हो जाये
खाविंद और मन्कूहा से
दो दोस्त वो दोनों
और
बन पाये दोस्त से
खुदा फिर,
मनाने को जश्न
धरती पर
सूरज, चाँद सितारों के नीचे
दो ज़िस्म और दो रूहों के
मिलन का...

(मन्कूहा : ब्याहता)

(यह राईट अमृता प्रीतम जी की कहानी 'मलिका' और उपन्यास 'एक खाली जगह' से प्रेरित है. अमृताजी हम सब की मोस्ट फेवरिट रचनाकारों में से एक हैं.)


अनकहा सा,,,,,,


छोटे छोटे एहसास 
==========

अनकहा सा कह देते हो जब तुम 
ख़ुद का क्या,मौसम भीग जाता है 
तुम चुप रहो या कहो कुछ भी 
ये दिल मेरा..सब जान जाता है 😊.

दूसरा बेहतर वर्ज़न :

छोटे छोटे एहसास 
==========

अनकहा सा कह देते हो जब तुम 
मैं तो क्या,मौसम भी भीग जाता है 
खामोशियाँ लब की,गुफ्तगू नज़रों की 
ये दिल मेरा..सब जान जाता है 😊.

दर्द के सोते,,,,,,,


छोटे छोटे एहसास 
=========

दर्द के सोते 
फूटे ज़मीं से 
के बरसे आसमाँ से, 
बहा ले जाते हैं 
सब कुछ 
उफनता 
एक सैलाब बन कर,,,,,

(ज़मीं से अर्थ दिल से हैं और आसमाँ आँखों को कहा गया है .)

छोटे छोटे एहसास,,,,,,


छोटे छोटे एहसास 
==========

१.
ज़ालिम ऐसा है की क़ाबू में नहीं रहता
सब सहता है मगर कुछ भी नहीं कहता...

२. 
अब एक जुगलबंदी एहसासात की :

खामोश लबों से कहता तो बहुत कुछ है
ये तो बस हम हैं कि अनसुना कर देते हैं,,,
                                (Not Mine)

क्या कहें फ़साने उनकी शोख़ नादानियों के
दिल मिरे को वो यक झुनझुना कर देते हैं,,,

३.
उम्र का क्या कट ही जाती यूँ भी 
वो आए तो रोशन मेरा जहाँ हो गया,,,

रूठ है खुदा तुम से,,,,,,,




रूठा है खुदा तुम से,,,,,,

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फ़ासले दिल के ज़ुबां से ना भर 
रास आए  ना प्यार की ये नज़र.

उम्र होती हैं मोहब्बत की भी यक 
ज़िंदा रहेगी हर पल ग़ुमां ना कर.

ज़ख़्म होते है हरे  फ़ितरत उनकी 
लगने दे खुली हवा मरहम ना कर.

क़ुबूल है हर गुनाह किया ना किया 
क़ातिल तेरा मुंसिफ़ गिला ना कर.

लिखी है ख़ुशियाँ जिया है उनको 
ग़म आएँ जो दर पे शिकवा ना कर.

दीद नम से बहे जाता है दर्दे दिल 
संभाल ले ख़ुद को उम्मीद ना कर.

क़तरा ए ख़ून से लिख दे तू ग़ज़ल
रूठा है खुदा तुझ से  दुआ ना कर.

मुहबत नहीं तो फिर क्या है



मुहब्बत नहीं तो ये इरादे फिर क्या है,,,,,,
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छू ना पाऊँ जो उसको साथ फिर क्या है
जुदाई का सबब ना है तो ये फिर क्या है.
लगी है आग बहरे दिल में जब से मेरे
लौ दिए की या आबे दीद फिर क्या है.
हो जाते हैं शिकवे भी मुहब्बत  में याराँ
मुहब्बत नहीं तो ये इरादे फिर क्या है.
हमने तो जिया है हर लम्हे फ़क़त उनको
मुझ पे एहसासे इज़ा हिज्राँ फिर क्या है.
लब चुप है अताब सोज़ ओ गुदाजाँ  है
चश्म ज़ाहिर बी से ये देखा फिर क्या है.
क्या कहूँ  मख्मूर हूँ मैं रात और दिन को
कैफियत ऐसी कि मेरी खुदी फिर क्या है.
मक्सूब जो था क्या यूँ ही गँवा डाला मैंने
मसला ए मक्सूम ओ अलैह  फिर क्या है.
डर है न निकल जाए मुंह से मेरे हर्फ़े राज
बंदये गयूर हूँ शक्लो शमाइ फिर क्या है.
मायने :
बहरे दिल=ह्रदय का सागर, आबे चश्म=आँख का पानी, इज़ा=कष्ट, हिज्राँ=विरह, अताब=क्रोध, सोज़=जलन
गुदाजाँ=पिघलता हुआ (रोने के सेंस में)चश्म ज़ाहिर बी=ऊपरी आँख,
मख्मूर=नशे में चूर, कैफियत=दशा, खुदी=गर्व, हर्फ़े राज=भेद की बात, बंदये गयूर=शर्मीला मर्द/ स्वाभिमानी पुरुष, शक्ल=सूरत शमाइल=स्वभाव, मक्सूब=अर्जित, मक्सूम= भाज्य याने  dividend, अलैह=divisor याने जिस नंबर से भाग देन

Saturday, 25 November 2017

मन वीणा को सुर देकर,,,,,,,



मन वीणा को सुर देकर....

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ना मिला था कोई अब तक
जिसे  स्वप्न मेरे बतलाता
जीकर संग में ही उसके
साकार उन्हें कर पाता,,,,,,

बना रहा मैं साधन
करने पूरे औरों के सपने
बहुत आये थे जीवन में
बन बन कर के अपने,,,,,

आदर्शों और वादों के खातिर
घुलता रहा था प्रतिपल
देख नहीं पाता कभी भी
हो नयन किसी के सजल,,,,

तले एहसानों के बीता था
मेरा अल्हड बचपन
पाकर कुछ भी न पाया
था ऐसा मेरा जीवन,,,,,,

जी  करता मुक्त हवा में
साँसे अपनी मैं ले लूँ
अपनी मर्ज़ी से मैं भी
जीवन अपना जी लूँ,,,,,,

माप सकूँ पहाड़ों को
नदी सागर सारे पी लूँ,
राह गली सब चल देखूं
संग पवन के मैं भी उड़ लूँ,,,,,,

हो कोई ऐसा जो मुझ को
आसमान दिखलाये
मोहे अपना सब कुछ देकर
मेरा सब कुछ पा जाये,,,,,

अल्हड़ कच्चेपन का
स्वाद मुझे चखाए
हंस हंस कर मुझे हंसाएं
फिर मुझ में ही छुप जाए,,,,,

नयी शरारत सीखला कर
बचपन मेरा लौटाए
एक छोटा सा नाम दे मुझको
और उससे मुझे बुलाये,,,,,,

मेरी हर रचना में दिखे
भाव मेरे बन जाए
नहीं अकेला,
है संग में कोई
एहसास यही दिलाये,,,,,

हर शै की नज़रों से बच कर
पास मेरे वो आये
फिर आने का वादा कर के
कभी लौट ना पाये,,,,,

मेरे नयनों के उष्ण नीर को
खुद ही वो पी जाए
शीतल अमृत देकर मुझ को
सरसे और सरसाये,,,,,

मेरे घावों पर अपनेपन की
मरहम वही लगाए
जब भी भटकूँ हाथ पकड़ कर
राह वही दिखलाये,,,,,

दस्तक हुई मेरे दर पर
मैंने जांचा और परखा
मिली ज़िन्दगी मुझ को
हुई थी ऐसी बरखा,,,,,

आज उसी आह्लाद को लेकर
हर पल मैं जीता हूँ
ले खुशबू उन फूलों की
अमृत विष सब पीता हूँ,,,,,,

मन वीणा को सुर दे कर
अपना जीवन जी लेता हूँ
क्षण क्षण के जीवन में
कुछ लेता और देता हूँ ,,,,,